मंगलवार, 18 मई 2010

आधुनिकता की भूख में अंधे भारतीय

भारत जो सम्पूर्ण विश्व के देशो से अलग है जहा लोग शान्ति और मोक्ष की तलाश में आते है . जब सब जगह भटक कर कुछ हासिल नही होता तब हताश होकर लोग भारत में आते है . आखिर क्यों आते है सभी को पता है भारत एक प्राक्रतिक खूबसूरती का देश है हर गाव में योगी , मंदिरों की शंख ध्वनी , गंगा जैसी पावन नदी , काश्मीर की वाडिया , उतराखंड की शान्ति , हिमाचल की ख़ूबसूरती , ये सब विदेशियों और भारतीयों दोनों को आकर्षित कर एक अलग सी शांति का अनुभव कराती है . यहा की सभ्यता छोटे बड़े का सम्मान श्रम लाज लज्जा जो पूरे विश्व में सबसे अलग और अनोखी है . इन सब चीजों के भारतीयों को पैसे नही देने पड़े और ये सब प्राक्रतिक है प्राचीन है . लेकिन अब भारत के लोग भी पश्चिम की लीक प़र चल निकले है अपने देश की खूबसूरती का बत्ठा ख़ुद बैठाने प़र तुले है . भारतीय संस्कृति को नष्ट करने में लगे है . यह काम तब से जारी है जब दो ; चार भारतीय विदेशो में शिक्षा लेने गये और उन्होंने भारत को भी वैसा ही बनाने के सपने संजोय . यहा की प्रक्रति से छेडछाड की और ये काम आज जोरो प़र है . आधुनिकता के अन्धो ने सदा अपने देश की मान मर्यादा को ध्यान में न रखकर भारतीयों को असभ्यता में धकेल दिया . और वही काम निरंतर जारी है पैसे कमाने की इस अंधी दोड़ में भारत को भी फ्रांस , इटली बनाना चाहते है .जंगलो , वनों , नदियों , पहाड़ो - पर्वतों , सब कुछ रोजगार के नाम प़र बर्बाद किया जा रहा है . हमारी आस्थाओं , संस्कार आधुनिकता  के नाम प़र सभी कुछ नष्ट - भ्रष्ट किया जा रहा है . और सरकार का इन प़र कोई प्रतिबंध नही है हम अपनी पहचान को मिटाकर कसे रोजगार पा सकते है . क्या इस तरह के जो काम भारत में चल रहे है भारत को विकसित देश बनाने के नाम प़र ये भारत में महंगाई , जमीन के रेटों में महंगाई को नही बढा रहे है जिससे आम आदमी पिस्ता जा रहा है और विदेशी कम्पनिया चाँदी कूट रही है . मक्खन  वो ले जा रहे है और भारत के १० % लोगो के हाथ लस्सी लग रही है . और बाकी के लोग इन सब के नीचे दबते जा रहे है और हम अध्निकता में यह सब देख नही पा रहे या जो लोग देख रहे है समझ रहे वे लोग आँख मिचे बैठे है

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