शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

कृपया मदद करे

मै अभी कुछ ही माह से ब्लोगिंग की दुनिया में आया हूँ आप लोगो के प्यार आशीर्वाद से जो बात मुझे गंभीर लगती है मै उस प़र लिख देता हूँ . मै आपसे कुछ मदद चाहता हूँ क्यों की आप लोग बहुत सालो से ब्लोगर हो इसलिए मेरे कुछ सवाल है आपसे कृपया उतर देने का कष्ट करे . मै भडास , दैट्स हिंदी  , और रफ़्तार जैसी वेबसाईट्स की सदस्यता लेना चाहता हूँ क्या यह साइटे भी ब्लोगवाणी की तरह निशुल्क है अथवा इनमे किसी प्रकार का कोई शुल्क लगता है . आपसे निवेदन कृपया बताये और जागरण प़र ब्लॉग डालने प़र भी किसी किस्म का कोई शुल्क है या वह निशुल्क है

गुरुवार, 22 अप्रैल 2010

फतवों और फरमानों का देश


भारत में लोकतंत्र भले ही बहाल हो  भले ही क़ानून  , प्रशासन हो परन्तु अब भी फतवों पंचायती फरमानों का डोर आरम्भ है . आखिर क्या कारण है की लोग ख़ुद को क़ानून से उपर समझ रहे है . क्या कारण है फतवों और पंचायत के फरमान हर माह मीडिया प़र छा जाते है . आजादी के ६३ सालो बाद भी पंचायतो प़र किसी जाती विशेष का अधिकार है फैसला , सज़ा देने का हक़ भी उसी जाती को है . भले वह फैसला कोई थोपा हुआ हो थोपे हुए फैसलों प़र भी सरकारे पुलिस हाथ बांधे क्यों खड़ी रहती है . क्या यह वोट बैंक की राजनीति है तभी सरकार ,पुलिस  कोई कारवाई नही करती . एसा क्यों होता जा रहा है जिस क्षेत्र में जिसकी संख्या अधिक वही उसका मालिक . क्या यही है समानाधिकार . वोट की राजनीति में दबंगई को बढ़ावा क्यों दिया जा रहा है अराजकता , अन्याय बढ़ने के कारणों को और शैह देने वाले कोन लोग है . पंचायत समाज को सही दिशाए देने के लिये होती है लेकिन आजकल की पंचायते जाती जैसी तुच्छ  मानसिकता में सिमट कर रह गयी है .  लेकिन इन्हें एसी मानसिकता प्रदान किसने  की फतवे कैसे भी हो लेकिन किसी किस्म की कोई भी करवाई का नही होना क्या दर्शाता है . इस तरह के फतव , पंचायती हुकूमत तो राजो , महाराजो के समय में होने का भी उल्लेख नही है . तब भी राजा का दरबार न्यायालय हुआ करता था लेकिन हाल कुछ एसा है जिसकी लाठी उसकी भैंस . लेकिन इन्हें चोधरी बनाने वाले लोग कोन है जिनके कारण इस  सबमे आम इंसान पिसा जा रहा है आज आम आदमी को ठीक से साफ़ पानी पिने तक की आजादी नही है और इन लोगो को अपने फरमान थोपने की . ये फतवे और ये दबंग लोगो का रवैया भारत को कहा ले जा रहे है समाज को अलग - थलग करने का हथकंडा भी यही से शुरू होता है . एक समाज को हर किस्म की भागीदारी दोऔर बाकी के लोगो के लिये कोई पॅकेज नोकरी कुछ नही .  ताकि बगावते हो और भारत के लोग जाती के नाम प़र लड़ते रहे मरते रहे . लेकिन ये चाहता कोन है कही यह फिर से भारतीयों को कमजोर करने की साज़िश तो नही जिसे भारत के लोग समझ नही पा रहे है

खाने में सुधार लाये बच्चो के सुनहरे भविष्य के लिये जागरूक हो



भारत मै शहर तेज़ी से बढ़ रहे है और उसी तेज़ी से खानपान भी बदल रहा है . खानपान महज़ स्वाद का मुदा बनकर रह गया है चाहे स्वाद के लिये स्वास्थ्य से समझोता ही क्यों न करना पड़े . एसा खानपान स्वाद की वजह भारतीयों को कायल तो बना रहा है लेकिन हड्डियों मै कमजोरी पैदा कर रहा है . शहर हो या गाव अब तो हर जगह ही यह प्रचलन चल निकला है . घी , दूध , दही , ताज़ा मखन खाने वाले लोग आइसक्रीम खाने प़र बड़ा ही गर्व अनुभव करते है . आज से लगभग १० साल पहले तक हरियाणा में सुबह का नाश्ता लह्स्सी घी और बाजरे के रोट और चटनी हुआ करते थे लेकिन अब चाए ब्रेड या बिस्कुट . जेम , ब्रेड टोस्ट और भी पता नही कितने पदार्थ सवाद से भरपूर . जो केवल स्वाद देते है और यही आदत आगे चलकर मजबूरी का रूप धारण करती है .लेकिन माँ बाप इसे मजबूरी बनाने में अहम भूमिका निभा रहे है आखिर क्यों . जो खाना शारीर को लगता नही है वही अपने बच्चो को खिलाया जा रहा है बच्चो के साथ कैसा खिलवाड़ है यह . एसा करने वाले दो तरह के माँ - बाप है १ वह जिन्हें सुबह दफ्तर जाना होता है और एक वह जिन्हें अमीरों के चोचले करने होते है या जो सुबह प्राथी आलू की गोभी की या दही जमाने में आलस बरतते है और अपना समय बच्चो में न देकर अपने जीवन का लुत्फ़ उठाते है . लेकिन आगे चलकर यह खाना बच्चो को उनकी हडियो को विकसित नही होने देता और उनकी हड्डिया चुने की तरह हो जाती है जो मजबूत नही होती .और व्यक्ति समय से पहले बीमारियों से ग्रस्त हो सकता है . जिससे की मानसिक संतुलन और शारीरक संतुलन बिगड़ सकता है आज कल खान पान में बहुत अधिक परिवर्तन आ गया है जो भारतीयों को बीमारियों की और ले जा रहा है . लेकिन माँ - बाप सही खुराक अपने बच्चो को दे तो वह भी एक बेहतर जीवन जी सकते है . अगर आपका बच्चा १० से १२ साल का है तो आप उससे केवल अच्छा पढने की ही उपेक्षा न करे उसके शारीर प़र भी ध्यान . बाजारों के चटर - पटर से बचाए और अपने पैसो को सही इस्तेमाल करे . अगर १६ से १८ साल की उम्र आपके बच्चे की है तो आप उसे कम से कम  १ ग्लास जूस रोजाना पिलाए . और बर्ह्म्चार का पालन कराए सुबह ४ या चाह बजे उठाकर आप उसे दोडाये . शुरुआत १ किलो मित्र से करे बाद में धीरे - धीरे बढाकर इसे आप चार किलो मित्र तक ले जाए . जिन बच्चो का स्पोर्ट्स में मन लगता है उन्हें १६ साल से रेस शुरू कर देनी चाहिए . स्पोर्ट्स में कारीअर भी है और नाम भी यश , पैसा सभी कुछ . लेकिन इस सब के लिये माँ - बाप के मार्गदर्शन की जरूरत होती है .  यह सब सवच्छ  भोजन से ही हो सकता है

मंगलवार, 20 अप्रैल 2010

अछे कर्म करने से आगे का भाग्य सुधार सकता है


दुखो के आने का कारण क्या होता है मनुष्य के कर्मो का फल . कर्म दो प्रकार के होते है एक भले कर्म और दुसरा बुरे . जब मनुष्य साधन - सम्पन्न हो जाता है तो वह जमकर उत्पात मचाता है और सभी धर्म कार्यो को भूलकर इश्वर भक्ति को भूलकर केवल रुपया कमाता है अथवा कमाए हुए रुपयों को खुलकर जीता है उनका आनन्द लेता है . मोह - माया मै डूबा मनुष्य अपने मित्रो से भी मुह मोड़ता है और कई बार परिवार भी उसे कोई ख़ास मैने नही लगता . वह सब कुछ गलत अच्छा खाने लगता है पश्चिमी सभ्यता का हो जाता है और अपनी आस्थाओं के साथ खिलवाड़ भी कर जाता है या उन्हें अंधविश्वास बताकर उनका अपमान करने लगता है . लेकिन समय चक्र जब सुखो का पूरा होता है तब धीरे - धीरे किसी न किसी तरीके से कर्मो का फल सामने अता है और मनुष्य या तो गरीब हो जाता है अथवा कोई बिमारी से गर्स्त भी हो जाता है . फिर भी बहुत सालो तक उसका घमंड नही टूट पाटा क्यों की वह होश मै नही होता . और जब गरीबी - दुःख हद्द से बढ़ते है तब वह हर मंदिर मै जाता है और ज्योतिषियों के पास जाता है . लेकिन ज्यादा समय ज्योतिषियों के पास ही जाता है वह कर्मो के रहस्य को जान नही पाता . मनुष्य तब संभलता है जब वह अपने कर्मो को समझता है उसे अहसास होता है तब जाकर वह कुछ धर्म कर्म कर अपने जीवन और अपने परिवार की स्थिति को धीरे - धीरे संभाल सकता है . इसमें उसे यह ध्यान मै रखना होता है जो कुछ भी हो रहा है और होगा सब भगवान् की कृपा से ही है लेकिन कर्म करना उसकी जिम्मेदारी कर्तव्य है . सनातम मै समस्त संसार को एक परिवार माना गया है लेकिन आज का मनुष्य अपने बीवी - बच्चो को परिवार मानता है और बाहर की दुनिया मै लुट खसूट कर अपने भाग्य को उजाड़ लेता है . इसलिए मनुष्य के कर्म सुख - दुःख मै सामान हो और सामान रूप से पक्षियों को दाना , कुत्ते को रोटी , पक्षियों को पानी , गाय को रोटी या हरा , खाग्ड़ को सानी हरा   देता रहे तो दुःख जीवन मै कभी भी नही आयेगा . अगर आपकी आर्थिक स्थिति कहती ही आप इन प्राणियों मै से किसी एक को पाल सकते है अथवा इन्हें भोजन दे सकते है तब भी यह आपकी श्रद्धा है . क्यों की यही सवर्ग है और यही नर्क है कर्मो का ही फेर है .

सोमवार, 19 अप्रैल 2010

पछतावा ' कवी कहता है की

सडक प़र चलते चलते ,दिखी एक चमचमाती सी चीज़ 
कपडे में लिपटी फिर भी , वो क्यों चमचमाए
सोच कर उसे उसने  , झोली में लिया  छुपाये
झोली में लिया छुपाये , सोचा क्या माल लगा हाथ में
दोड़ा दोड़ा जा रहा था , तभी ठोकर  लगी उसके  पाँव
टपक टपक कर रीस रही , फीर भी उसे  शर्म न आये
लालच से मन भरा था , घर जाकर जल्दी ये चीज़ झलक दिखाए
पहुच गया जब घर वह , तब चीज़ वो फूटी आँख न सुहाए
आत्मा भी गाली देने लगी , ये क्या तुम ले  आये
ये क्या तुम ले आये , क्या तुम ले आये
लालच भरा मन जब भी , कोई गलत चीज़ लाये
मन बड़ा पछताए , किसी का कोई क्यों फिर कुछ उठाये

क्या कोई हरिजन का लड़का ब्राहमण नही हो सकता

अगर कोई ब्राह्मण है और उसका बेटा व्यापारी तो उसे किस दृष्टि से ब्राह्मण कहा जाये . जब उसे कर्मकांडो और वेद , शास्त्र , गीता , पुराण का ज्ञान ही नही तो उसे किस तरह ब्राहमण कहा जा सकता है क्या उसे पंडित जी कह सकते है . या सही होगा उसे पंडित कहना ठीक इसी तरह किसी हरिजन का लड़का वेदों का कर्मकाण्डो का ज्ञान रखता है . उसे हरिजन कैसे कहा जा सकता है. उसे अधिकार क्यों नही ब्राहमण कहने का जब की उसे ज्ञान है . भगवान ने मनुष्य को कर्म करने के लिए धरती प़र भेजा है उसे अपना भविष्य बनाने के लिए दान धर्म करने के लिए पृथ्वी प़र भेजा है . कर्मानुसार वर्गो में शामिल होने का हक़ दिया है अगर किसी हरिजन का लड़का पवित्र रहता हुआ और सभी तरह के ज्ञान के बावजूद भी ब्राह्मण नही हो सकता यह मनुष्य की मनमानी करने जैसा है . कोई भी मनुष्य जन्म से महान नही होता तो जन्म से ही ब्राहमण या क्षत्रिय या शुद्र , वैश्य कैसे हो सकता है . जब से जातीय बनी है भारत कमजोर हो रहा है और धर्म परिवर्तन की समस्या से जूझने का भी कारण यही है . हम वर्ग व्यवस्था को भुलाकर जाती व्यवस्था में जब से आये है तभी से हम उलझते ही जा रहे है . भेद भाव बढ़ रहा है दबंगी बढ़ रही है और जो शुद्र है वह दबता ही जा रहा है . छोटा व्यापारी दब रहा है . और भारतीय विद्या से भारतीयों का कटाव हो रहा है अंग्रेजी बढ़ने का भी कारण यही है . अगर यह अधिकार दे दिया जाये तो वेद शास्त्रों गीता , और पुराणो की हर घर तक पहुच होगी. और भारतीयों में जाती - पाती की तुछ भावना दूर होगी

पानी बिन मै और तुम

 भले वैज्ञानिक चाँद प़र पानी ढूंढ़ रहे हो लेकिन धरती प़र पानी सिमट रहा है . राजस्थान , पंजाब, हरियाणा , मध्य परदेश सब जगह पानी को लेकर हाहाकार है . चार दिन बाद पानी की सप्लाई आती है हैंडपंप , कुए तालाब सुख रहे है . राजस्थान में लोग तालाब का पानी पी रहे है और साथ ही उसकी रक्षा के लिये रात को भी तालाब के पास लट्ठ लेकर खड़ा रहना पड़ रहा है कही कोई दुसरा गाव उनका पानी न चुरा ले . एम् पी , देहली में लोग पानी के लिये लड़ रहे है लम्बी लम्बी कतारों के बावजूद एक घडा ' मटका ' पानी मुश्किल से मिल रहा है . कई राज्यों में लोग २ , २ किलोमीटर की दूरी तय कर पानी की मटकी सर प़र उठाने को मजबूर है . पानी की किल्लत तक लोग सहन कर रहे है उपर से सूर्य देव की तपिश कई सालो का रिकार्ड तोड़ रही है एसे में एक मटका पानी और पैदल लाना पड़े तो सोचिये आज का इंसान कैसी जिन्दगी जी रहा है . जिसमे शोपिंग मोल , बड़ी बड़ी दुकाने तो है सड़के है लेकिन पिने का पानी नही अगर है तो सवच्छ नही . इंसान ग़रीबी से भले लड़ ले लेकिन प्यास से नही . भूख मिटाने की गोलिया भले ही मेडिकल साइंस में हो लेकिन प्यास भुजाने की नही . आखिर क्यों पानी सुख रहा है इसके कारणों में इंसान की आधुनिक होने की ललक भी हो सकती है आज इंसान पेड़ नही लगाता और न ही वनों का संरक्षण करने के लिये उसके पास समय है . हर इंसान को एक बड़ा घर बनाना है लेकिन उसके भीतर पेड़ लगाना जरूरी नही है हर इंसान को जमीन खरीदनी है फैक्ट्रिया लगाने का ब्योत बनाना है प्लाट काटने है कलोनिया काटनी है भले उसके लिये पड़ो से लदे बाग़ उजाड़ने पड़े . देशी- विदेशी कम्पनियों का दायरा बढ़ता जा रहा है बड़ी बड़ी इमारते बन रही है खेत खलिहानों को स्वार्थ पूर्ण खत्म किया जा रहा है . गाडी हर इंसान खरीद रहा है उनकी धुलाई - धुलाई प़र ही पर्तिदिन लाखो लिटर पानी खर्च हो रहा है . यह सब खरीद कर बनाकर भारत को आधुनिक बना दिया जाए लेकिन पानी से वंचित होकर . पानी बिना कहा होंगे हम और आप .

रविवार, 18 अप्रैल 2010

पानी बिन मै और तुम

भले वैज्ञानिक चाँद प़र पानी ढूंढ़ रहे हो लेकिन धरती प़र पानी सिमट रहा है . राजस्थान , पंजाब,  हरियाणा , मध्य परदेश सब जगह पानी को लेकर हाहाकार है . चार दिन बाद पानी की सप्लाई आती है हैंडपंप , कुए तालाब सुख रहे है . राजस्थान में लोग तालाब का पानी पी रहे है और साथ ही उसकी रक्षा के लिये रात को भी तालाब के पास लट्ठ लेकर खड़ा रहना पड़ रहा है कही कोई दुसरा गाव उनका पानी न चुरा ले . एम् पी , देहली में लोग पानी के लिये लड़ रहे है लम्बी लम्बी कतारों के बावजूद एक घडा ' मटका ' पानी मुश्किल से मिल रहा है . कई राज्यों में लोग २ , २ किलोमीटर की दूरी तय कर पानी की मटकी सर प़र उठाने को मजबूर है . पानी की किल्लत तक लोग सहन कर रहे है उपर से सूर्य देव की तपिश कई सालो का रिकार्ड तोड़ रही है एसे में एक मटका पानी और पैदल लाना पड़े तो सोचिये आज का इंसान कैसी जिन्दगी जी रहा है . जिसमे शोपिंग मोल , बड़ी बड़ी दुकाने तो है सड़के है लेकिन पिने का पानी नही अगर है तो सवच्छ  नही . इंसान ग़रीबी से भले लड़ ले लेकिन प्यास से नही . भूख मिटाने की गोलिया भले ही मेडिकल साइंस में हो लेकिन प्यास भुजाने की नही . आखिर क्यों पानी सुख रहा है इसके कारणों में इंसान की आधुनिक होने की ललक भी हो सकती है आज इंसान पेड़ नही लगाता और न ही वनों का संरक्षण करने के लिये उसके पास समय है . हर इंसान को एक बड़ा घर बनाना है लेकिन उसके भीतर पेड़ लगाना जरूरी नही है हर इंसान को जमीन खरीदनी है फैक्ट्रिया लगाने का ब्योत बनाना है प्लाट काटने है कलोनिया काटनी है भले उसके लिये पड़ो से लदे बाग़ उजाड़ने पड़े . देशी-  विदेशी कम्पनियों का दायरा बढ़ता जा रहा है बड़ी बड़ी इमारते बन रही है खेत खलिहानों को स्वार्थ पूर्ण खत्म किया जा रहा है . गाडी हर इंसान खरीद रहा है उनकी  धुलाई - धुलाई प़र ही पर्तिदिन लाखो लिटर पानी खर्च हो रहा है . यह सब खरीद कर बनाकर भारत को आधुनिक बना दिया जाए लेकिन पानी से वंचित होकर . पानी बिना कहा होंगे हम और आप .

रिश्ते बचेंगे कब तक ?

भारतीय जीवन पद्धति में रिश्तो की बड़ी अहमियत होती है परन्तु अब यह अहमियत धीरे - धीरे घटती जा रही है . भारतीयों का एक दुसरे से कटाव हो रहा है कुछेक कारण उंच - नीच होने लगी है तो कुछ कारण ओरतो और पुरुषो दोनों का ही  आत्याधिक मॉडर्न ' आधुनिक ' होना भी है . आज घर  आये मेहमान को चन्द घंटो में चलता कर दिया जाता है . कारण कोई भी रिश्तेदार आता है तब दोनों मिया - बीवी को काम प़र जाना होता है और संयुक्त परिवार तो पहले ही टूटते जा रहे है . ओरते पुरुषो की तरफ दफ्तर जाने लगी है घर प़र शाम को दोनों मिया बीवी का आना होता है एसे में रिश्तेदार कहा रहेंगे और कहा रहेंगी रिश्तेदारी . नारी अथवा पुरुष की यह सोच भारत में रिश्तो के महत्व को कम करने में लगी है . अगर यही हाल रहा तो माँ - बाप अपने बच्चो को बचपन में ही बाहर पढने भेज देंगे यह हाल अब भी है परन्तु अभी कुछ हद तक सिमित है . लेकिन इसका तेज़ी से फैलाव हो रहा है . अगर यही हाल रहा तो क्या आगे शादी जैसे रिश्ते की जरुरत रहेगी . पती - पतनी  के पवित्र रिश्ते में समय ही नही रहेगा आज से कुछ सालो बाद तो कोई शादी की अहमियत कैसे समझ पायेगा . रिश्तो की अहमियत माँ - बाप के प्यार को कोन समझेगा . आज तक भारतीय समाज जो पवित्रता बनाता आया है उसे कोन सहेज कर रखेगा . कही यह तनाव पूर्ण जीवन सवार्थी जीवन भारतीयों को मानसिक रोगों की तरफ तो नही ले जा रहा . जिसमे न ही बच्चो के लिये समय है और न ही सास - ससुर की सेवा के लिये . अगर भारतीय एसी जीवन शैली अपना कर मात्र पैसा कमाना चाहते है तो वह भारत में  पश्चिमी सभ्यता का ही परचम लेहरा रहे है . इस सभ्यता से न तो समाज का कल्याण होगा और न ही भावनाओं की कद्र और रिश्ते तो महज़ मजाक बन कर रह जायेंगे .

शुक्रवार, 16 अप्रैल 2010

शाकाहार नहीं है चांदी का वर्क!


चांदी के वर्क में लिपटी मिठाई कैंसर जैसी बीमारी का घर तो है ही, लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ भी है। जी हां, चांदी का यह वर्क पशुओं की आंतों के जरिए जिस तरह बनता है उससे यह शाकाहार तो कतई नहीं रहता। योगगुरु बाबा रामदेव ने इस तरीके से वर्क बनाने पर प्रतिबंध की मांग की है।


चांदी का वर्क बनाने की प्रक्रिया की जानकारी दैनिक भास्कर ने जुटाई। इसमें जो तथ्य सामने आए, वह ऐसी मिठाइयों का सेवन करने वाले किसी भी व्यक्ति को झकझोर सकते हंै। दरअसल इसे पशुओं की ताजा आंत के अंदर रखकर कूट-कूट कर बनाया जाता है। दूसरी तरफ विभिन्न अध्ययन बताते हैं कि चांदी का वर्क मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है।

लखनऊ स्थित इंडियन इंस्ट्टियूट आफ टॉक्सिकोलॉजी रिसर्च (आईआईटीआर) के एक अध्ययन के मुताबिक बाजार में उपलब्ध चांदी के वर्क में निकल, लेड, क्रोमियम और कैडमियम पाया जाता है। वर्क के जरिए हमारे पेट में पहुंचकर ये कैंसर का कारण बन सकते हैं। 2005 में हुआ यह अध्ययन आज भी प्रासंगिक है क्योंकि वर्क बनाने की प्रक्रिया जस की तस है।

शिमला के इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल के मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर डॉ. राजेश कश्यप के अनुसार धातु चाहे किसी भी रूप में हो, सेहत के लिए काफी नुकसानदेह होती है। इससे सबसे ज्यादा नुकसान लीवर, किडनी और गले को होता है। आईटीसी की मेटल एनालिसिस लेबोरेटरी के एन. गाजी अंसारी के अनुसार चांदी हजम नहीं होती। इससे पाचन प्रक्रिया पर प्रतिकूल असर तो पड़ता ही है, नर्वस सिस्टम भी प्रभावित हो सकता है।



आजकल बाजार में चांदी के नाम पर एल्यूमिनियम, गिलेट आदि के वर्क धड़ल्ले से बिक रहे हैं जो कही ज्यादा हानिकारक हंै। पुणो स्थित एनजीओ ब्यूटी विदाउट क्रुएलिटी (बीडब्ल्यूसी) के मुताबिक एक किलो चांदी का वर्क 12,500 पशुओं की आंतों के इस्तेमाल से तैयार होता है। एक अनुमान के मुताबिक देश में सालाना लगभग 30 टन चांदी के वर्क की खपत होती है। इसे बनाने का काम मुख्य रूप से कानपुर, जयपुर, अहमदाबाद, सूरत, इंदौर, रतलाम, पटना, भागलपुर, वाराणसी, गया और मुंबई में होता है।





ऐसे बनता है वर्क:

चांदी के पतले-पतले टुकड़ों को पशुओं की आंत में लपेट कर एक के ऊपर एक (परत दर परत) रखा जाता है कि एक खोल बन जाए। फिर इस खोल को लकड़ी से धीरे-धीरे तब तक पीटा जाता है जब तक चांदी के पतले टुकड़े फैलकर महीन वर्क में न बदल जाएं। पशुओं की ताजा आंत मजबूत और मुलायम होने से जल्दी नहीं फटती है। इसी वजह से इसका उपयोग किया जाता है



बाबा रामदेव ने कहा- धार्मिक अशुद्धि का मामला



योगगुरु बाबा रामदेव ने भास्कर से कहा कि चांदी का वर्क बनाने के ऐसे कारखानों को तुरंत बंद करना चाहिए। यह धार्मिक अशुद्धि का मामला है। उन्होंने कहा कि आयुर्वेदिक दवा के रूप में चांदी की भस्म का सेवन ठीक रहता है, वह भी निश्चित मात्रा में। दिगंबर जैन आचार्य विशुद्ध सागर जी का भी मानना है कि ऐसे वर्क से बनी मिठाई खाने योग्य नहीं होती। ऐसी मिठाइयों से बचना चाहिए।





ऐसी चीजो को जीवन में शामिल करना है या नही फैसला आपके हाँथ है

ये लेख हिंदी समाचार पत्र दैनिक भास्कर से लिया गया हैhttp://ptstsanchar.blogspot.com/2010/04/blog-post_16.html

इस सबके पिछे माँ- बाप दोषी कितने

बिगडती संस्कृति के पीछे माँ बाप का दोष कितना है  लगभग  ८० %. बचपन से ही माँ - बाप अपने बेटे - बेटियों को भारतीय संस्कृति से अलग करने में लग जाते है सकूल में जाते ही माँ - बाप अपने बच्चो से अंग्रेजी कविता सुनना चाहते है . उसे दूध , घी , दही की जगह जो दिया जाता है वह केवल सवाद तक सिमित होता है . बच्चो को तरह - तरह की छूट दी जाती है आखिर क्यों . इसलिए भारतीय समाज से वह अलग दिखे उसके रंग ढंग कपडे सब कुछ पश्चिमी कर दिया जाता है . बड़े होते - होते उनके दिमाघ में ड़ाल दिया जाता है बड़ा होकर डॉक्टर , इन्ज़ीनीअर बनना है . और उसे व्यक्तिवादी बना दिया जाता है एसा व्यक्ति जिसे अपने देश की फ़िक्र कम ख़ुद के भविष्य की फ़िक्र ज्यादा होती है . पांच - पांच साल तक उसे बड़े शहरो में भेज दिया जाता है जहा कुछ लड़के मोज मस्ती में डूब जाते है . भारतीय सभ्यता को न समझने वाले ये बच्चे युवा होते - होते एक दम पश्चिमी हो जाते है जिन्हें परिवार से लेना - देना कम होता है . पहले के जमाने में ३० - ३० साल तक बटवारा नही होता था लेकिन अब नोकरी लगते ही शादी और बटवारा . संयुक्त परिवार टूट जाते है आखिर क्यों माँ - बाप की अकान्शाओ की  वजह         से  . एसी आकान्शाये  जो केवल पैसो से सिमित होती है जिसमे संस्कारतो की बलि देनी पड़ती है  पैसो के लिये एक दुसरे से आगे निकलने के लिये . इसमें व्यक्ति पैसा तो कमा लेता है लेकिन अपने देश से उसकी जड़े - पैर उखड़ने लगते है सही मायनों में उन बच्चो को शान्ति और प्यार नही मिलता . मिलता है तो सिर्फ तनाव और रहने के लिये पर्दुषित  हवा पानी , खाना छोटे - छोटे  घर न कोई पड़ोस . बस घर से दफ्तर और दफ्तर से घर एसी जिन्दगी हो जाती है आज के युवाओं की . माँ - बाप की सोच बचे को कामयाब देखने की होती है लेकिन कामयाबी के पिछे दर्दनाक अकेलापन होता है

बुधवार, 14 अप्रैल 2010

यह कैसी सोच

भारत में राजनीति जाती प़र आधारित है जिस जाती के वोट की जनसंख्या अधिक उसी को कुर्सी . एम् पी होया एम् एल ए सभी जगह जातीय सम्मिकर्ण टटोलने के बाद ही टिकेट  मिलती है . आखिर भारतीय राजनीति किस और जा रही है जहा भले ही अपनी जाती का उम्मीदवार गुंडा हो लेकिन वोट अपनी जाती के उम्मीदवार को . भले सामने वाला पढ़ा लिखा या कुशल और नर्म सवभाव वाला उम्मीदवार हो उसे वोट नही दिया जाता . आखिर इस सबके पीछे कोन है . क्या आम जनता जो चोधर  का लोभ रखती है इसलिए उसकी मजबूरी अपनी जाती का दम ख़म  दिखाने की होती जा रही है  . या पार्टिया जो अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिये जातीय सम्मिकर्ण के आधार प़र टिकटे  बाटकर हमारी सोच को एक जाती तक सिमित कर रही है . हम देश के बारे में न सोचकर सवार्थी हो रहे है हमें कोन स्वार्थी बना रहा है हमें कोन बता रहा है तुम इस जाती से हो और अपनी जाती को ही वोट दो . हमें क्यों बताया जाता है हमारी जाती ने आजादी के लिये अथवा किसी भी क्षेत्र में  कितनी तरक्की की . हमारी सोच ने आजादी के समय राष्ट्रवादी रूप धारण किया था लेकिन कुछ सालो बाद हम अपने क्षेत्रो में बटे . लेकिन अब हम एक विस्फोटक स्थिति में खड़े है जिसमे हम अपना राजनैतिक अस्तित्व चाहते है अपनी जाती की बात करते है . जहा हम अपने देश के ही लोगो को ख़ुद से उपर नीचा समझते है यह कैसी सोच है जो अपने ही देश के लोगो को दीमक की तरह खाए जा रही है . भले ही नेताओं ने जनता को बाटा हो लेकिन हम इतिहास क्यों भूल जाते है क्यों फिर से वही गुलामी काल की पर्था को जीवित करने में लगे है क्यों उंच नीच का पाठ पढ़ और नयी पीढ़ी को पढ़ा रहे है .

शनिवार, 10 अप्रैल 2010

असभ्यता , अश्लीलता पैर फैला रही है

भारत जिसे आज भी सभ्यता से जाना जाता है लेकिन इस सभ्यता प़र प्रहार हो रहा है . ख़ुद अपने ही लोग इसे असभ्य बनाने की तक में है और असभ्यता फैला रहे है . अश्लीलता फैलाई जा रही है युवा अपनी संस्कृति को छोड़ पश्चिमी होते जा रहे है . दो , दो गल्फरैंड रखना नोजवानो के शोक है सडको प़र हाथ में हाथ डालकर घूमना यह भारत को भारत कम और इण्डिया ज्यादा दर्शाता है . लेकिन युवा तो पहले भी होते थे और अधिक सवस्थ और हट्टे खट्टे  होते थे वह तो इस प्रकार की हरकते नही करते  थे . गर्ल फरैंड तो पहले भी होती थी लेकिन इस प्रकार सडको गलियों में नही घुमा जाता था . कही यह एक कारण तो नही है बढ़ते बलात्कारो का हमारे बदलते परिधान भड़काऊ कपडे .आज के युवा फ़िल्मी हीरो को अपनी जीवन शैली  में उतार रहे है आज की फिल्मो का हीरो भी अपनी गर्ल्फरैंड को सडको प़र घुमाता है और २ , ३ गर्फरैंड रखता है और इसी बात को आम नोजवान अपने जीवन में उतारते है . हीरो लोग हो या फिल्म निर्माता ये लोग तो यह सब पैसो के लिये करते है इन्हें इन बातो से मतलब नही होता की इससे देश के लोगो की मानसिकता पश्चिमी होती है जिसे इस देश के लोग इजाज़त नही देते . एसा ही कुछ बिजनैस में हो रहा है आई पी एल जो एक खेल भी है और बिजनेस भी इसमें भी दर्शको को खीचने के लिये चीयरगर्ल्स का सहारा लिया जा रहा है . करिकेट के खेल को भी एक तमाशा सर्कस बना दिया गया है जिस मैच को करोडो भारतीय देख रहे है वहा भी असभ्यता सडको से लेकर बाजारों तक सिनेमा से लेकर खेल के मैदानों तक . किसी साबुन को बेचना है तो उस प़र भी हीरोइन की अश्लील फोटो . किसी प्रोडक्ट की ऐड में भी हीरोइन के उत्तेजित दृश्य . देश यह जिस और जा रहा है उसमे सभ्य  इंसानों की कहा जगह होगी आज जिसकी गर्लफ्रैंड है उसी के दोस्त है . या उन्हें भी हिंदी भाषा की ही तरह दूसरी श्रेणी में ड़ाल दिया जाएगा

गुरुवार, 1 अप्रैल 2010

भारत का एक तबका बच्चा एक ही अच्छा की राह प़र

टीवी प़र प्रचार किया जाता रहा है एक लडका एक लड़की . हम दो हमारे दो एसा परचार बसों प़र ऑटो प़र टीवी प़र ऐड के द्वारा किया जाता रहा है . इस परचार से काफी कुछ सिखा है भारतीयों ने . आज भारतीय परिवार एक लड़का लड़की हम दो हमारे दो की राह प़र चल पड़े है जो देशहित के लिये जरूरी है . इससे बढ़ रही जनसंख्या नियन्त्रण में होगी . लेकिन कुछ लोग एसे भी है जो आज भी २ नही चार नही छः  या १० बच्चे पैदा कर रहे है देश की जनसंख्या पहले ही एक सो बीस करोड़ तक पहुच चुकी है . लेकिन आज भी भारत में बहुत से लोग ८ , ८ बचे पैदा कर जनसंख्या और बेरोजगारी को बढ़ा रहे है जो की चिंता का विषय  है . टीवी प़र भी परचार किये जाते है लेकिन बहुत से लोग इन पर्चारो इन देश से जुड़े मुद्दों का या तो विरोध में है या वह अपने जीवन में इन बातो को उतार नही पा रहे है . अगर भारत को जनसँख्या नियन्त्रण करना है तो सख्त नियम लागु करने होंगे