शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010

होली के पीछे छुपे हैं कई वैज्ञानिक तथ्य

भारतीय  त्योहारों प़र अन्धविश्वास जैसे आरोप लगते रहते है . कुम्भ प़र गंगा स्नान  प़र तो कभी भगवान राम के अस्तित्व प़र . अब कुछ दिनों बाद होली है जाहिर है कुछ लोग इसे ' होली खेलने वालो को पागल भी कह सकते है  लेकिन हम लोगो को उनकी बातो में नही अना चाहिए साथ ही सत्य को देखना समझना चाहिए ताकि हिन्दू धर्म प़र ऊँगली उठाने वालो से भी रहा न जाए इन त्योहारों की महिमा गए बगैर . होली का धार्मिक महत्व तो है ही इसका वज्ञानिक महत्व भी है जो नई पीढ़ी को समझाने की आवश्यकता है ताकि सनातम धर्म की महानता को वह भी जान सके .होली का त्यौहार न केवल मौज-मस्ती, सामुदायिक सद्भाव और मेल-मिलाप का त्यौहार है बल्कि इस त्यौहार को मनाने के पीछे कई वैज्ञानिक कारण भी हैं जो न केवल पर्यावरण को बल्कि मानवीय सेहत के लिए भी गुणकारी हैं।




वैज्ञानिकों का कहना है कि हमें अपने पूर्वजों का शुक्रगुजार होना चाहिए कि उन्होंने वैज्ञानिक दृष्टि से बेहद उचित समय पर होली का त्यौहार मनाने की शुरूआत की। लेकिन, होली के त्यौहार की मस्ती इतनी अधिक होती है कि लोग इसके वैज्ञानिक कारणों से अंजान रहते हैं।



होली का त्यौहार साल में ऐसे समय पर आता है जब मौसम में बदलाव के कारण लोग उनींदे और आलसी से होते हैं। ठंडे मौसम के गर्म रूख अख्तियार करने के कारण शरीर का कुछ थकान और सुस्ती महसूस करना प्राकृतिक है। शरीर की इस सुस्ती को दूर भगाने के लिए ही लोग फाग के इस मौसम में न केवल जोर से गाते हैं बल्कि बोलते भी थोड़ा जोर से हैं।



इस मौसम में बजाया जाने वाला संगीत भी बेहद तेज होता है। ये सभी बातें मानवीय शरीर को नई ऊर्जा प्रदान करती हैं। इसके अतिरिक्त रंग और अबीर शुद्ध रूप में- जब शरीर पर डाला जाता है तो इसका उस पर अनोखा प्रभाव होता है।



बापू नेचर क्योर हास्पिटल एवं योगाश्रम के डा. प्रधान ने बताया कि होली पर शरीर पर ढाक के फूलों से तैयार किया गया रंगीन पानी, विशुद्ध रूप में अबीर और गुलाल डालने से शरीर पर इसका सुकून देने वाला प्रभाव पड़ता है और यह शरीर को ताजगी प्रदान करता है।



जीव वैज्ञानिकों का मानना है कि गुलाल या अबीर शरीर की त्वचा को उत्तेजित करते हैं और पोरों में समा जाते हैं और शरीर के आयन मंडल को मजबूती प्रदान करने के साथ ही स्वास्थ्य को बेहतर करते हैं और उसकी सुंदरता में निखार लाते हैं। होली का त्यौहार मनाने का एक और वैज्ञानिक कारण है। हालांकि, यह होलिका दहन की परंपरा से जुड़ा है।



शरद ऋतु की समाप्ति और बसंत ऋतु के आगमन का यह काल पर्यावरण और शरीर में बैक्टीरिया की वृद्धि को बढ़ा देता है लेकिन, जब होलिका जलाई जाती है तो उससे करीब 145 डिग्री फारेनहाइट तक तापमान बढ़ता है। परंपरा के अनुसार जब लोग जलती होलिका की परिक्रमा करते हैं तो होलिका से निकलता ताप शरीर और आसपास के पर्यावरण में मौजूद बैक्टीरिया को नष्ट कर देता है। और इस प्रकार यह शरीर तथा पर्यावरण को स्वच्छ करता है।



दक्षिण भारत में जिस प्रकार होली मनाई जाती है, उससे यह अच्छे स्वस्थ को प्रोत्साहित करती है। होलिका दहन के बाद इस क्षेत्र में लोग होलिका की बुझी आग की राख को माथे पर विभूति के तौर पर लगाते हैं और अच्छे स्वास्थ्य के लिए वे चंदन तथा हरी कोंपलों और आम के वृक्ष के बोर को मिलाकर उसका सेवन करते हैं।



कुछ वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि रंगों से खेलने से स्वास्थ्य पर इनका सकारात्मक प्रभाव पड़ता है क्योंकि रंग हमारे शरीर तथा मानसिक स्वास्थ्य पर कई तरीके से असर डालते हैं। पश्चिमी फीजिशियन और डाक्टरों का मानना है कि एक स्वस्थ शरीर के लिए रंगों का महत्वपूर्ण स्थान है। हमारे शरीर में किसी रंग विशेष की कमी कई बीमारियों को जन्म देती है और जिनका इलाज केवल उस रंग विशेष की आपूर्ति करके ही किया जा सकता है।



होली के मौके पर लोग अपने घरों की भी साफ सफाई करते हैं जिससे धूल-गर्द, मच्छरों और अन्य कीटाणुओंका सफाया हो जाता है। एक साफ सुथरा घर आमतौर पर उसमें रहने वालों को सुखद अहसास देने के साथ ही सकारात्मक ऊर्जा भी प्रवाहित करता है।

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2010

क्या वास्तव में भारतीय कमजोर है

क्या वास्तव में भारतीय कमजोर है बहुत से लोग हां कहेंगे और बहुत से नही . वैसे ये मिली जुली प्रक्रिया भी सही है कुछ मायनो में . अगर इतिहास को देखा जाए तो हम लोग बहुत  समय तक गुलाम रहे कभी मुगलों तो कभी अंग्रेजो के अत्याचार सहते रहे .विश्व की सबसे पुरानी सभ्यता को वे लोग बर्बाद करते रहे लेकिन भारतीय उन्हें खदेड़ न सके यह बाटे नई पुरानी पीढ़ी को सोचने प़र मजबूर करते है क्या हम वास्तव में कमजोर है या थे ?
                                   लेकिन कुछ लोग यह भी समझ सकते है की हम कमजोर कभी नही रहे श्री राम जी को ही ले हजारो सालो पहले रावण को उसी के देश में जाकर हराया था . या कलियुग की बात ले ९३,००० सैनिको को गुलाम बनाकर भारत ने पूरे विश्व में अपने साहस का परिचय दिया था . या पृथ्वी राज चोहान को ही ले जिन्होंने ७७ बार मुहम्मद गोरी को माफ़ी दी वह अलग बात है अठात्र्वी बार  मुह्हमद गोरी की फतह हुई और उसने पृथ्वीराज  जी की आंखे निकाल ली . या झाँसी की रानी साहस पुरुषो में ही नही महिलाओं में भी है भारतीय साहसी और निडर तो है इसमें दो राए बनाना गलत होगा .  लेकिन फिर क्यों हम कमजोर पड़ते है ?. हम एक दयालु देश और नागरिक है क्षमा हमारा आभुष्ण है और इसी का दुश्मन हर बार गलत फायदा उठाता है कभी हम गुलाम होते है और कभी हम आतंकी हमले में मरते है . भारत में युग युग , समय -समय प़र म्हापूरुशो ने जन्म लिया और सन्देश दिया अधर्म के खिलाफ लड़ो . गीता में श्री कृष्ण अर्जुन  से कहते है  ' हे अर्जुन उठो अधर्म के खिलाफ लड़ो क्षत्रिय धर्म निभाओ ' . यहा वह किसी एक जाती को सन्देश नही दे रहे है वह हर भारत वंशी को कह रहे है अधर्म से लड़ो . लेकिन क्षत्रिय को एक जात समझ लिया  गया  और युद्ध केवल एक जाती तक सिमित होने लगा . कुछ एसा ही सन्देश गुरु गोबिंद सिंग जी ने दिया था और उन्होंने नारा दिया था 'एक लाख से एक लदाऊ तभी नाम गोबिंद कहलाऊ ' . और एसा ही उन्होंने किया . लेकिन आज तक हम इन संदेशो को अपने जीवन में नही उतार सके तभी हमारे दुश्मन देश हम प़र बम फोड़ते है और हम उन प़र दया करते है

शनिवार, 13 फ़रवरी 2010

अमन की आशा '''''''' fuuuuuuuuuusssssssssssss '

२६ - ११ के बाद एक बार फिर से भारत प़र बड़ा हमला हुआ है इस बार निशाने प़र सिर्फ और सिर्फ भारत ही था  . कई न्यूज़ चैनल कहते है यहूदियों का पूजा सथल निशाना था लेकिन पूजा सथल किसी और देश में नही भारत में ही तो था . कुछ विदेशियों को आतंकियों का निशाना बताते है लेकिन वह  भी तो भारत में हमारे मेहमान ही है . कुछ ही दिन पहले आतंकियों ने बड़ी रैली की लाहोर में जिसमे खुलम - खुल्ला भारत प़र हमले की चेतावनी दी गयी थी . और हुआ भी वैसा ही . और इसी बीच निकली एक आशा '  अमन की आशा ' . और तुरंत ही फूस साबित भी हो गयी होना ही था . पाक के साथ दोस्ती अथवा मधुर सम्बन्ध ठीक उसी तरह है किसी पागल कुत्ते के गले में रस्सी बांधकर उससे लाड प्यार करने के बराबर . क्यों की पाक की हालात भी उसी पागल की तरह है जिसे हम कितना भी प्यार दे वह हमे काटेगा ही . उसका हमारे हरियाणा में तो एक ही इलाज़ होता है ' लठो से पीटकर मारना ' . ठीक है हम लोग दयालु है लेकिन दया की हद्द हो गयी है अब क्या हमने मार खाने का ठेका ले रखा है . होना तो ये चाहिए की पाक हमारे पैरो में गिरकर माफ़ी मांगे लेकिन जो हो रहा है वह दुनिया की नजर में हमे कमजोर साबित कर रहा है . हम इतिहास से सिख भले ले अथवा नही वर्तमान से तो सिख ले . पाक प़र हमें सिर्फ और सिर्फ हमला करना चाहिए ' आर या पार  ' . कोई बात नही  केवल हमला बारूद का जवाब बारूद से हर एक जख्म का जवाब देना चाहिए . कोई आशा की तरंग नही फूटनी चाहिए  ' इनफ इज इनफ

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010

गरीबी मिटाई जा सकती है लेकिन मिडिया को उसका प्रचार बेहतर ढंग से करना होगा

आजादी के तरेसठ साल बाद भी ७० करोड़ लोग बीस रूपए से कम प़र गुजारा  कर रहे है . दूसरी तरफ केवल एक फिल्म को चलाने के लिए १ दिन के लाखो रूपए खर्च किये जा रहे है . और मीडिया भी दिन - भर शिव सेना - राज ठाकरे मसाला लोगो की कवरेज में लगा रहता है . मीडिया को शाहरुख़ , कारण जोहर , अमिताभ बच्चन ,एश्वर्या राए , कटरीना कैफ इन लोगो में दिलचस्पी है लेकिन भूख से मरते लोगो की तरफ सरकार का ध्यान दिलाने में नही . अमिताभ को अगर कोई बीमारी हो जाये तो पूरे भारत को हिला दिया जाता है लेकिन असम जैसे राज्य में ३०० लोग भी बम विस्फोट से मार जाये तो कोई चीटी भी नही रेंगती कान के पास से . अगर भारत किरकेट   में जीत जाये तो ' चक दे इण्डिया ' सारा दिन . लेकिन उड़ीसा जैसे राज्य में लोग भूख मारी से तडपते रहे देश का ध्यान उस तरफ खीचना बिलकुल भी उसकी जिम्मेदारी नही . गरीबी भारत में है लेकिन इसे मिटाया जा सकता है बस जरुरत है तो साफ़ नियत की . जैसे बाढ़ बिहार में आती है तो पूरा भारत दिल खोलकर मदद करता है यह सब मिडिया की अछाई से कवरेज के कारण संभव होता है . भावनाओं को जगाया जाये इमानदारी से कोई पहल की जाये तो उड़ीसा ही नही भारत के हर राज्य से गरीबी को खत्म किया जा सकता है . लेकिन मीडिया वाले तब तक उस जगह प़र नही जाते जब तक की वहा कोई बड़ा हादसा या आतंकी वारदात न हो जाए . अगर मीडिया वाले गरीब राज्यों में जाकर वहा की स्थिति से भारतीयों को रूबरू कराये और कुछ भावनाए जगाई जाये तो भारत में दानियो की कोई कमी नही है . क्यों की यह दानवीर कर्ण की नगरी है जिस प्रकार अग्रसेन महाराज ने एक नियम लागू किया था एक रुपया एक ईट एसा ही नियम आज लागु करने की जरुरत है . ताकि इस देश में से गरीबी को मिटाया जा सके इस तरह के नियमो में हर आदमी दिल खोलकर देता है चाहे वह गरीब हो या आमिर . लेकिन मीडिया को यह बेहतर लगता है आज कोन सी फिल्म रीलिज़ हो रही है अथवा आज किस हीरोइन   का जन्मदिन है

गुरुवार, 4 फ़रवरी 2010

कलर्स चैनल के कुछ धारावाहिक सच्चाई से दूर

भाइयो कलर्स का कोई भी धारावाहिक हो पहले कुछ लिखा आता है ' हम इन बुराइयों के खिलाफ है ' हमारा किसी जाती विशेष ' से इस धारावाहिक का कोई सम्बन्ध नही . लेकिन जो लोग इन धारावाहिकों को देखते है वे भली भांति जानते है किस तरह की छवि प्रस्तुत की जा रही है . अब देखिये एक धारावाहिक १० बजकर ३० मिनट प़र ' न आना इस देश लाडो ' शुरू होता है . उस धारावाहिक में एक किरदार है अम्मा जी जिनकी बोली हरियाणवी है . अब जो इस धारावाहिक को देखता होगा तो उसके मन में हरयाणा की क्या छवि उतरती होगी . हरयाणा एक भारत का प्रान्त है जहा गाव की लड़की के पती को पूरा गाव दामाद मानता है . लेकिन इस धारावाहिक में अम्मा जी अपनी भतीजी को एक सरकारी अपसर को सोपती दिखाई जाती है . हरयाणा में बड़े ही स्वाभिमानी लोग रहते है लेकिन ये सब उट पटांग बाते  हरयाणा की कोन सी छवि पर्स्तुत करते है . या हिन्दू समाज की कोन सी छवि प्रस्तूत करती है . एक और धारावाहिक है जिसमे एक ठाकुर को लड़की प़र अत्याचार करता दिखाया गया है . क्या यह किसी जाती विशेष प़र निशाना नही है क्या इस तरह की बातो से समाज मज़बूत होता है . या समाज में अधिक कडवाहट बढ़ रही है . हर समाज में बुराई होती है लेकिन बार बार ठाकुर . ठाकुर कहना हमारे दिलो में कड़वाहट  भी घोल सकता है . क्या सभी ठाकुर एक जैसे होते है अगर इस प्रकार से दिखाते है महाराणा प्रताप को प़र कोई धारावाहिक नही बनाया जाता . समाज में एक बेहतर सन्देश भी दिया जा सकता है . इसी तरह हरयाणा के लोगो में देशभक्ति    की भावना कूट कूट कर भरी है कारगिल युद्ध हो या १९७१ ,१९६५ की लड़ाई सभी ल्दैयो में हर्यानावासियो ने बढ़ चढ़ कर  भाग liya  है . हरयाणा आज भारत का एसा राज्य है जहा लड़की के पैदा होने प़र भी थालिया बजाई जाती है . लड्डू  बाटे जाते है . मै कभी क्षेत्र वाद की बात नही करता लेकिन एसी बातो का विरोध तो करना ही पड़ता है . भारत के इतिहास प़र भी कोई धारावाहिक बन सकता है पहले भी तो श्री कृष्ण , रामायण , जैसे धारावाहिक बनते थे लेकिन आजकल तो उंच नीच बस और कोई मुद्दा ही नही जैसे . एसी बाते दिलो को जख्मो को कुरेदती है अब भारत में कुछ कुछ क्षेत्रो में जातिवाद कम हो रहा है . लेकिन इस तरह धारावाहिक दिलो और दिमाग़ो में जहर भर रहे है . कलर्स हो या कोई भी चैनल अपनी तो एक ही विनती है समाज को तोड़ो मत  मज़बूत करो