शुक्रवार, 16 अप्रैल 2010

इस सबके पिछे माँ- बाप दोषी कितने

बिगडती संस्कृति के पीछे माँ बाप का दोष कितना है  लगभग  ८० %. बचपन से ही माँ - बाप अपने बेटे - बेटियों को भारतीय संस्कृति से अलग करने में लग जाते है सकूल में जाते ही माँ - बाप अपने बच्चो से अंग्रेजी कविता सुनना चाहते है . उसे दूध , घी , दही की जगह जो दिया जाता है वह केवल सवाद तक सिमित होता है . बच्चो को तरह - तरह की छूट दी जाती है आखिर क्यों . इसलिए भारतीय समाज से वह अलग दिखे उसके रंग ढंग कपडे सब कुछ पश्चिमी कर दिया जाता है . बड़े होते - होते उनके दिमाघ में ड़ाल दिया जाता है बड़ा होकर डॉक्टर , इन्ज़ीनीअर बनना है . और उसे व्यक्तिवादी बना दिया जाता है एसा व्यक्ति जिसे अपने देश की फ़िक्र कम ख़ुद के भविष्य की फ़िक्र ज्यादा होती है . पांच - पांच साल तक उसे बड़े शहरो में भेज दिया जाता है जहा कुछ लड़के मोज मस्ती में डूब जाते है . भारतीय सभ्यता को न समझने वाले ये बच्चे युवा होते - होते एक दम पश्चिमी हो जाते है जिन्हें परिवार से लेना - देना कम होता है . पहले के जमाने में ३० - ३० साल तक बटवारा नही होता था लेकिन अब नोकरी लगते ही शादी और बटवारा . संयुक्त परिवार टूट जाते है आखिर क्यों माँ - बाप की अकान्शाओ की  वजह         से  . एसी आकान्शाये  जो केवल पैसो से सिमित होती है जिसमे संस्कारतो की बलि देनी पड़ती है  पैसो के लिये एक दुसरे से आगे निकलने के लिये . इसमें व्यक्ति पैसा तो कमा लेता है लेकिन अपने देश से उसकी जड़े - पैर उखड़ने लगते है सही मायनों में उन बच्चो को शान्ति और प्यार नही मिलता . मिलता है तो सिर्फ तनाव और रहने के लिये पर्दुषित  हवा पानी , खाना छोटे - छोटे  घर न कोई पड़ोस . बस घर से दफ्तर और दफ्तर से घर एसी जिन्दगी हो जाती है आज के युवाओं की . माँ - बाप की सोच बचे को कामयाब देखने की होती है लेकिन कामयाबी के पिछे दर्दनाक अकेलापन होता है

2 टिप्‍पणियां:

  1. मां-बाप को बच्चों की देखभाल करनी चाहिए। लेकिन ख्याल ये भी रखना चाहिए कि देखभाल में लाड-प्यार इतना ना बच्चे को मिल जाए कि उसे ये लगे कि अब तो उस पर किसी प्रकार का कोई बंधन ही नहीं है। क्योंकि याद रखिए जितने मैच्योर मां-बाप हो सकते हैं उतने बच्चे नहीं होंगे।

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