सोमवार, 19 अप्रैल 2010

पछतावा ' कवी कहता है की

सडक प़र चलते चलते ,दिखी एक चमचमाती सी चीज़ 
कपडे में लिपटी फिर भी , वो क्यों चमचमाए
सोच कर उसे उसने  , झोली में लिया  छुपाये
झोली में लिया छुपाये , सोचा क्या माल लगा हाथ में
दोड़ा दोड़ा जा रहा था , तभी ठोकर  लगी उसके  पाँव
टपक टपक कर रीस रही , फीर भी उसे  शर्म न आये
लालच से मन भरा था , घर जाकर जल्दी ये चीज़ झलक दिखाए
पहुच गया जब घर वह , तब चीज़ वो फूटी आँख न सुहाए
आत्मा भी गाली देने लगी , ये क्या तुम ले  आये
ये क्या तुम ले आये , क्या तुम ले आये
लालच भरा मन जब भी , कोई गलत चीज़ लाये
मन बड़ा पछताए , किसी का कोई क्यों फिर कुछ उठाये

6 टिप्‍पणियां:

  1. abhi tak asamanjas me hun akhir wo kya cheez hai...
    http://dilkikalam-dileep.blogspot.com/

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  3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  4. इस नए चिट्ठे के साथ हिंदी ब्‍लॉग जगत में आपका स्‍वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!

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  5. कली बेंच देगें चमन बेंच देगें,

    धरा बेंच देगें गगन बेंच देगें,

    कलम के पुजारी अगर सो गये तो

    ये धन के पुजारी वतन बेंच देगें।

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