बुधवार, 14 अप्रैल 2010

यह कैसी सोच

भारत में राजनीति जाती प़र आधारित है जिस जाती के वोट की जनसंख्या अधिक उसी को कुर्सी . एम् पी होया एम् एल ए सभी जगह जातीय सम्मिकर्ण टटोलने के बाद ही टिकेट  मिलती है . आखिर भारतीय राजनीति किस और जा रही है जहा भले ही अपनी जाती का उम्मीदवार गुंडा हो लेकिन वोट अपनी जाती के उम्मीदवार को . भले सामने वाला पढ़ा लिखा या कुशल और नर्म सवभाव वाला उम्मीदवार हो उसे वोट नही दिया जाता . आखिर इस सबके पीछे कोन है . क्या आम जनता जो चोधर  का लोभ रखती है इसलिए उसकी मजबूरी अपनी जाती का दम ख़म  दिखाने की होती जा रही है  . या पार्टिया जो अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिये जातीय सम्मिकर्ण के आधार प़र टिकटे  बाटकर हमारी सोच को एक जाती तक सिमित कर रही है . हम देश के बारे में न सोचकर सवार्थी हो रहे है हमें कोन स्वार्थी बना रहा है हमें कोन बता रहा है तुम इस जाती से हो और अपनी जाती को ही वोट दो . हमें क्यों बताया जाता है हमारी जाती ने आजादी के लिये अथवा किसी भी क्षेत्र में  कितनी तरक्की की . हमारी सोच ने आजादी के समय राष्ट्रवादी रूप धारण किया था लेकिन कुछ सालो बाद हम अपने क्षेत्रो में बटे . लेकिन अब हम एक विस्फोटक स्थिति में खड़े है जिसमे हम अपना राजनैतिक अस्तित्व चाहते है अपनी जाती की बात करते है . जहा हम अपने देश के ही लोगो को ख़ुद से उपर नीचा समझते है यह कैसी सोच है जो अपने ही देश के लोगो को दीमक की तरह खाए जा रही है . भले ही नेताओं ने जनता को बाटा हो लेकिन हम इतिहास क्यों भूल जाते है क्यों फिर से वही गुलामी काल की पर्था को जीवित करने में लगे है क्यों उंच नीच का पाठ पढ़ और नयी पीढ़ी को पढ़ा रहे है .

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