रविवार, 18 अप्रैल 2010

पानी बिन मै और तुम

भले वैज्ञानिक चाँद प़र पानी ढूंढ़ रहे हो लेकिन धरती प़र पानी सिमट रहा है . राजस्थान , पंजाब,  हरियाणा , मध्य परदेश सब जगह पानी को लेकर हाहाकार है . चार दिन बाद पानी की सप्लाई आती है हैंडपंप , कुए तालाब सुख रहे है . राजस्थान में लोग तालाब का पानी पी रहे है और साथ ही उसकी रक्षा के लिये रात को भी तालाब के पास लट्ठ लेकर खड़ा रहना पड़ रहा है कही कोई दुसरा गाव उनका पानी न चुरा ले . एम् पी , देहली में लोग पानी के लिये लड़ रहे है लम्बी लम्बी कतारों के बावजूद एक घडा ' मटका ' पानी मुश्किल से मिल रहा है . कई राज्यों में लोग २ , २ किलोमीटर की दूरी तय कर पानी की मटकी सर प़र उठाने को मजबूर है . पानी की किल्लत तक लोग सहन कर रहे है उपर से सूर्य देव की तपिश कई सालो का रिकार्ड तोड़ रही है एसे में एक मटका पानी और पैदल लाना पड़े तो सोचिये आज का इंसान कैसी जिन्दगी जी रहा है . जिसमे शोपिंग मोल , बड़ी बड़ी दुकाने तो है सड़के है लेकिन पिने का पानी नही अगर है तो सवच्छ  नही . इंसान ग़रीबी से भले लड़ ले लेकिन प्यास से नही . भूख मिटाने की गोलिया भले ही मेडिकल साइंस में हो लेकिन प्यास भुजाने की नही . आखिर क्यों पानी सुख रहा है इसके कारणों में इंसान की आधुनिक होने की ललक भी हो सकती है आज इंसान पेड़ नही लगाता और न ही वनों का संरक्षण करने के लिये उसके पास समय है . हर इंसान को एक बड़ा घर बनाना है लेकिन उसके भीतर पेड़ लगाना जरूरी नही है हर इंसान को जमीन खरीदनी है फैक्ट्रिया लगाने का ब्योत बनाना है प्लाट काटने है कलोनिया काटनी है भले उसके लिये पड़ो से लदे बाग़ उजाड़ने पड़े . देशी-  विदेशी कम्पनियों का दायरा बढ़ता जा रहा है बड़ी बड़ी इमारते बन रही है खेत खलिहानों को स्वार्थ पूर्ण खत्म किया जा रहा है . गाडी हर इंसान खरीद रहा है उनकी  धुलाई - धुलाई प़र ही पर्तिदिन लाखो लिटर पानी खर्च हो रहा है . यह सब खरीद कर बनाकर भारत को आधुनिक बना दिया जाए लेकिन पानी से वंचित होकर . पानी बिना कहा होंगे हम और आप .

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