शनिवार, 2 जनवरी 2010

बदला बदला सा सब कुछ यहा

    नया नया सा दीखता सब कुछ यहाँ
  अब वह खेत नही खलिहान नही
न ही वह जोहड़ गाय भैंस  पीती थी पानी जहा                             
  बदला बदला सा सब कुछ यहा

     नही घरो में बनती अब देसी घी की चुरिया
     न ही घरो में सुनती दादी माँ की कहानियाँ
     नही  लगती वे चोपाले  जहाँ  लगते थे कभी ठहाके
ताऊ चाचा न  कोई हो गये अब सभी सर हमारे
     बदला बदला सा सब कुछ यहा

     नही सजती वो महफ़िल दोस्तों की
    नही लगते वे मेले जिनमे हम थे कभी खेले
   कुश्ती कब्बडी से अब है दूरिया
  एक गेंद के पीछे पड़े है ग्यारह यहाँ
    बदला बदला सा सब कुछ यहा    

नही जलता अब साँझा   चूल्हा
अब मै  हूँ और मेरी तन्हाईया
   अब मै   हूँ और मेरी तन्हाईया
नया नया सा दीखता सब कुछ यहाँ

1 टिप्पणी:

हर टिपण्णी के पीछे छुपी होती है कोई सोच नया मुद्दा आपकी टिपण्णी गलतियों को बताती है और एक नया मुद्दा भी देती है जिससे एक लेख को विस्तार दिया जा सकता है कृपया टिपण्णी दे