शनिवार, 23 जनवरी 2010

हिंदी का अपमान भारतीयों का अपमान

कहने को तो हिंदी राष्ट्र भाषा है मातर भाषा है लेकिन इसे कितना सम्मान मिलता है इसका अंदाजा तभी लग जाता है तब कोई भी बड़ा नेता अथवा व्यापारी मिडिया के सामने कुछ भी बोलता है . कभी किसी नेता को हिंदी बोलते देखा है आपने या कोई बड़ा व्यापारी . आज किसी भी शहर में चले जाइये आपको कोई भी दुकान या शोपिंग मोल हो अथवा कोई भी सरकारी इमारत बड़े बड़े बोर्ड दिखाई देंगे जिन पर अंग्रेजी में महकमे का (डिपार्टमेंट) का नाम लिखा होगा . आप हमारे फ़िल्मी कलाकारों को ही लीजिये वे लोग भी खाते हिंदी की है पर गुण अंग्रेजी में गाते है . आज भारत में एसे सैकड़ो स्कूल है जहा हिंदी बोलने तक पर मनाही है या यु कहे सजा भी दी जाती है . लेकिन बात करते है कैम्ब्रिज विश्वविधालय की जहा १५० सालो से संस्कृत और हिंदी पर अध्यन चाल रहा था या यु समझिये पढाई जा रही थी वह पिछले वर्ष ही बैन कर दी गयी . लेकिन भारत में हिंदी स्कूलों की जनसंख्या घट रही है और अंग्रेजी स्कूलों की बढ़ रही है यानि हिंदी अब यहाँ भी सुरक्षित  नही है . अपने ही देश में . कुछ लोगो की राय है अंग्रेजी सीखना बहुत जरूरी हो गया है वश्विक तोर पर . लेकिन क्यों क्या हिंदी को जानने वाले केवल भारत में है .  नही एसा नही है पाकिस्तान , मलाशिया ,नेपाल , मारीशस ,भूटान जैसे कई देश है जहा हिंदी बोली समझी जाती है . कैम्ब्रिज में अगर हिंदी पर बैन लग सकता है तो भारत में अंग्रेजी पर क्यों नही . जिन अंग्रेजो ने हम पर २०० साल राज किया .हमें गुलाम बनाया लुटा यहाँ तक की देश के दो टुकड़े भी कर दिए हम उनकी शैली को इतना सम्मान क्यों दे रहे है . हम उन्ही की संस्कृति अथवा भाषा को माथे का तिलक लगाये क्यों घूम रहे है. वे लोग हमें पैरो तले रोंदते  रहे हम उन्हें सर पर बैठा रहे है

2 टिप्‍पणियां:

  1. भारत के लोगों ने ही हिन्दी को कमजोर किया है. आप ब्लाग जगत में ही देख लीजिए अभियांत्रिकी से संबंधिक कितने हिन्दी ब्लाग हैं. गिनकर जरा बताइये. मेरी जानकारी में एक भी नही. यदि अभियांत्रिकी का ज्ञान हिन्दी में आ जाएगा तो फ़िर कोई क्यों अंग्रेजी को पढेगा पर ये दस पैसे की बात हमारे हाई फ़ाई लेखकों और विद्वानों के समझ में नही आएगी. वो तो अंग्रेजी में ही लिखेंगे. भारत के वैज्ञानिक अपनी खोज अंग्रेजी में क्यों करते हैं वो हिन्दी, तमिल, मराठी, गुजराती आदि में क्यों नही करते हैं? फ़िर उसका अनुवाद भले ही अंग्रेजी समेत दुनिया की किसी भी भाषा में हो सकता है. लेकिन वो खोज अंग्रेजी में ही करेंगे खोज संबंधी दस्तावेज सब अंग्रेजी में ही रहेंगे. जब अंग्रेज भारत आए तो सोच में पड़ गए कि इतने समृद्ध देश को तो गुलाम बनाना संभव ही नही है फ़िर उन्होने एक राजनीति खेली वो ये कि उन्होने भारतीयों के मन में ये बात डालनी शुरू कर दी कि यूरोप के पुस्तकालयों में भरा हुआ ज्ञान यहां से अधिक बेहतर है. कोट पैंट धोती कुर्ते पैजामें से बेहतर है. भारतीय चीजें पिछड़ेपन की निशानी है. बस अब अंग्रेज तो देश छो्ड़कर चले गए परंतु ये सोच अभी तक भारतीयों के मन में है. जिससे उनका शोषण आज भी हो रहा है.

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  2. सही कहा आपने, जब हम ही सम्मान नहीं देते तो औरो की क्या बात करें ।

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