चिट्ठाजगत
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गुरुवार, 31 दिसंबर 2009

कारण जो भी हो लेकिन बड़ी भयानक होती है गरीबी



गरीबी बहुत ही भयानक सच है जिंदगी का . और एक जहर की तरह होती है गरीबी वो जहर जो न तो मरने देता है और न ही जीने . परिस्थिया एसी बन जाती है की इन्सान न चाहकर भी कुछ एसा करने को मजबूर हो जाता है जो किसी भी इन्सान के उसूलो के खिलाफ हो . क्यों आती है गरीबी क्या पिछले जन्मो के पापो से या फिर अनपढ़ता कारण है इसका . कारण जो भी हो लेकिन बड़ी भयानक  होती है गरीबी . कल रात कलर्स पर एक सेरियल देखा तब से मुझे भोत देर नींद नही आई . सोचता रहा एक तरफ तो हम लोगो में से ही बहुत से लोग केवल नाम के लिए करोड़ो रुपयों से dharmshalaye  बनवाते है .और उन्ही के ही भाई बंधुओ के घर पर बहन बेटियों को इज्ज़त तक का सोदा करना पड़ रहा है . यह सच्चाई भारत की है लेकिन कड़वी भी और सच्ची भी .नक्कू शाहा के साथ भी एसा है कुछ हो रहा है . एसे सीरियल हर आम खास की आंख खोल देते है लेकिन कुछ लोग इसे एक नाटक की तरह लेते है और कुछ लोग १ मिनट आसूं बहा के फ़र्ज़ निभा देते है . इस देश में किसी के पास १०० . १०० एकड़ जमीन है और किसी के पास एक वक्त की रोटी के लाले . जब भी हम किसी गाड़ी या बस  पर सफ़र कर रहे होते है भिखारी या झोपडियों को देखकर अपने सिस्टम को कोसते है . लेकिन ख़ुद के अन्दर झांक कर कोई नही देखता . जाती के नाम पर बहुत से संगठन बन जाते है लेकिन गरीबी को मिटाने या किसी गरीब को सहारा देने के लिए कुछ नही है हमारे पास . इतनी गरीबी न तो कोई एक आदमी मिटा सकता है और न ही  कोई एक सरकार . अब पहल कोन करे . आज नया साल है रात में ही मेरे कसबे के कई युवा चंडीगढ़ कोई गोवा और कोई .लेकिन मेरे ही कसबे में कुछ लोग एसे भी होंगे जिनके लिए आज भी वही  शुक्रवार है . कारण जिंदगी से संघर्ष बाहरी दुनिया की किसे खबर कारण गरीबी . लेकिन बनाओ धर्म्शालाये मनाओ ; हैप्पी न्यू इयर '

इस नव वर्ष पर संकल्प ले भारत को मज़बूत करने का

इस नव वर्ष पर संकल्प ले भारत को मज़बूत करने का . वह संकल्प बिना मोमबत्ती जगाये और बिना आसूं बहाए भी लिया जा सकता है . इसे लेने के लिए बस देशभक्ति होना जरूरी है . न ही लाठियों की आवश्यकता है और न ही किसी हथियार की जरूरत है तो केवल इच्छाशक्ति की . नये साल का जश्न हर बार नाच गाकर तो कटे ही होंगे लेकिन इस बार कुछ न्य कीजिये जिससे केवल आपके ग्रुप के मित्र दोस्त ही नही हर भारतीय भारतीय से जुड़े . संकल्प लीजिये की हम कभी भी किसी भी शेत्र से व्यापर करने आए किसी व्यक्ति या उसके परिवार से न ही सोतेला व्यव्हार करेंगे और न ही किसी और को उससे कुछ भी गलत करने देंगे . संकल्प लीजिये अपनी जाती से न तो किसी पर दबाव बनायेंगे और न ही अपनी जाती की गाथा को गायेंगे .

  1. और आप में से कोई भी किसी की भी जात पूछने को उत्साहित न हो 
  2. और  न ही खुद की जात बताने को
  3. और अगर आप विदेश में जाते है तो वहा भी सबसे पहले भारतीय ही कहे खुद को
  4. अपने बच्चो को भी यही सन्देश दे उन्हें उंच नीच का पाठ न पढाये
याद  रखिये  हम भारत की मिटटी से बने है और हमारे सामने वाला चाहे किसी भी  परदेश का हो वह भी भारतीय है सभी को नव वर्ष की  हार्दिक  बधाई 

बुधवार, 30 दिसंबर 2009

भारत दर्शन कीजिये जानिए भारत को


भारत माता की जय





सोमवार, 28 दिसंबर 2009

देश के नागरिक ही देश की जड़ो को खोखला कर देते है .

आज कल नोजवानो के शोक बदल गये है . वह अपने कर्तव्य से भटक रहे है सच बात तो यह है हर भारतीय अपने कर्तव्य से भटक रहा है . युवाओ के शोक नई मोटर bike और मोबाइल महंगे कपड़ो और ज्यादा पैसो वाली नोकरी तक ही सिमित है . वह जीवन भर अपने आपको साधन संपन्न करने पर ही बल देता है .और सम्पूर्ण लाइफ को मनोरंजन तक ही सिमित रखता है . आज का युवा इतना स्वार्थी होता जा रहा है की उसे देश के प्रति कर्तव्य नजर नही आता . अपनी पर्सनैलिटी और पैसो की और आकर्षण रहता है .


साम दंड भेद किसी भी तरीके से केवल रुपया . किसी भी भारतीय में रुपया कमाने की चाहत अधिक हो रही है और चाहत में लोग अपने उसूलो से भी समझोता कर लेते है . भारत में लोग बहुत जल्दी बिक जाते है अगर एसा नही होता तो क्या भारत गुलाम होता . वही चाहत आज भी है ख़ुद के स्वार्थ साधने की इसके लिए चाहे देश को कितनी भी हानी हो . लेकिन हार इन्सान आमिर बनना चाहता है . ख़ुद को विकसित तो करना चाहता है लेकिन दुसरो के घरो में बारूद लगाकर . जहा इस देश में देश के लिए देश के लोगो के लिए क़ुरबानी देने वाले लोग हुए है वही हमारे ही देश में इसी देश में ख़ुद के निजी स्वार्थो के लिए देश को ताक पर रखने वाले लोग भी हुए है . लेकिन वर्तमान में स्वार्थी लोगो की जनसँख्या बढ़ रही है और देशभक्तों की संख्या घट रही है . और यही से भारत कमजोर हो जाता है देश के नागरिक ही देश की जड़ो को खोखला कर देते है . बढ़ रहा भर्ष्टाचार भी पैसे की भूख और निजी स्वार्थ के कारण ही फ़ैल रहा है .




रविवार, 27 दिसंबर 2009

भारत में चुनाव होते है

भारत में चुनाव होते है यह सभी जानते है . लेकिन चुनावो में उम्मीदवार की जीत के पीछे छुपी होती है कई
कहानिया . एसी सच्ची  कहानिया  जो चुनावो को एक आन या शान की बात बना देती है . एक पूरी जाती के सम्मान की बात बना देती है .जातीय सम्मिकरण ही हार जीत का चुनाव करते है .भारतीयों में जाती को महानता के सत्र पर ले जाने का जज्बा दिनों दिन बढ़ रहा है . कोई भी उम्मीदवार कितना भी समझदार या जनता के सुख दुःख में काम आने वाला क्यों न हो उसकी जीत का दावा तब तक नही किया जा सकता जब तक जातीय  सम्मिकरण   उसके पक्ष में न हो .इस कदर भारत में जाती पाती का जहर दिनों दिन बढ़ता जा रहा है की कोई भी उम्मीदवार अच्छा हो लेकिन जब तक उसके जातीय सम्मिकरण साथ नही है उसका जीतना कठिन होता है .इसे देश का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा .लेकिन वह उम्मीदवार कोई भी हो चाहे कितने भी आरोप लगे हो उस पर लेकिन होना वोटर की जात का ही चाहिए . इस सोच से ही जाती पाती के जहर को और बढ़ावा मिलता है . बार बार जीतने से नागरिको में आपस की खाई बढती है और इसी कारण दबंग लोग पैदा होते है .

अपनी ख़ुशी से कोई कम खुश होता है

अपनी ख़ुशी से कोई कम खुश होता है 
दुसरो  की ख़ुशी से उसे गम होता है
दर्द जब होता है  उसका मर्ज़ नही  होता है
जब दुसरो को दर्द हो तो वही मर्ज़ होता है
                                                               इसे उसकी फितरत कहु या उसकी मजबूती
                                                               बार बार जख्म हमें देकर वह खुश होता है
                                                               घर में आग लगे तो भी वह कही और आग लगाता है
                                                            बजाय अपनी आग भुजाने के घर वो किसी और के जलाता है
                                             
                                               कभी ताज तो कभी डेल्ही को वो दहलाता है
                                                 कभी कश्मीर को वो अपना बताता है
                                            न घर को कभी वह दुश्मनों से बचाता है
                                       दोस्त की पीठ तलवार डाल कर जख्म वह दे जाता है
                                                                               
                                                                           
                                                              
                                                                             टुकड़े कर के भी वह शांत नही बैठा है
                                                                             घर की आग न भुजाकर वो आग यहा लगाता है
                                                                             अपनी ख़ुशी से कोई कम खुश होता है




                                                                                    दुसरो की ख़ुशी से उसे गम होता
                                               

पहली बार कुछ कविता की तरह ब्लॉग पर लिखा है हो सकता है कुछ गलतियाँ हो आप का साथ मिला तो शायद अगली बार इससे अच्छा लिख सकू

बुधवार, 23 दिसंबर 2009

• गिनीज बुक कैसे बनी?

सन 1951 की बात है। ह्यूज बीवर उन दिनों गिनीज ब्रेवरीज में काम करते थे। एक दिन वे अपने दोस्तों के साथ चिड़ियों का शिकार करने के लिए निकले। युवा शिकारियों का यह दल कुछ समझ पाता इससे पहले ही उनके सामने से चिड़ियाओं का एक झुंड बहुत तेजी से निकल गया। ह्यूज और उनके दोस्त हैरत में पड़ गए कि आखिर ये कौन सी चिड़ियाएँ है थीं जो इतनी तेजी से उड़ती हैं। कुछ का अंदाजा था कि वह बया जैसा कोई पक्षी था जबकि कुछ कह रहे थे कि वह तीतर से मिलती कोई प्रजाति थी। यह तय नहीं हो पाया कि आखिर वे कौन सी चिड़ियाएँ थीं।










ह्यूज ने घर आकर यह पता लगाने के लिए किताबें अलटी-पलटी कि आखिर योरप का सबसे तेज उड़ने वाला पक्षी कौन सा है। कई किताबें उलटने के बाद भी उन्हें अपनी जिज्ञासा का उत्तर नहीं मिला। ह्यूज अपने काम में लगे रहे। 1954 में एक किताब में उन्होंने अपने प्रश्न का उत्तर पाया, यह भी कोई बहुत प्रामाणिक उत्तर नहीं था।







इस पूरी घटना से ह्यूज बीवर के मन में यह बात आई कि कई लोगों के मन में इस तरह के प्रश्न उठते होंगे और उनका उत्तर न मिलने पर इन्हें कितनी निराशा होती होगी। ह्यूज ने यह विचार अपने मित्रों को सुनाया।







मित्र ने उन्हें नोरिस और रॉस मॅक्विटर नाम के दो युवकों से मिलाया। ये दोनों लंदन में एक तथ्यों का पता लगाने वाली एजेंसी के लिए काम करते थे। ‍तीनों ने मिलकर 1955 में पहली गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्‍स निकाली और फिर धीरे-धीरे यह नई किताब लोगों को इतनी पसंद आने लगी कि इसकी प्रतियाँ हर साल बढ़ती गईं।







आज इस रिकॉर्ड बुक में नाम दर्ज करवाने के लिए दुनियाभर के लोग उत्सुक रहते हैं और तरह-तरह के काम करते हैं। ह्यूज एक मुश्किल में पड़े और उससे एक नया रास्ता निकला। याद रहे, हर मुश्किल के पास सिखाने के लिए बहुत कुछ होता है
http://hindi.webdunia.com/miscellaneous/kidsworld/ajabgajab/ से लिया गया