चिट्ठाजगत
www.blogvani.com

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

कृपया मदद करे

मै अभी कुछ ही माह से ब्लोगिंग की दुनिया में आया हूँ आप लोगो के प्यार आशीर्वाद से जो बात मुझे गंभीर लगती है मै उस प़र लिख देता हूँ . मै आपसे कुछ मदद चाहता हूँ क्यों की आप लोग बहुत सालो से ब्लोगर हो इसलिए मेरे कुछ सवाल है आपसे कृपया उतर देने का कष्ट करे . मै भडास , दैट्स हिंदी  , और रफ़्तार जैसी वेबसाईट्स की सदस्यता लेना चाहता हूँ क्या यह साइटे भी ब्लोगवाणी की तरह निशुल्क है अथवा इनमे किसी प्रकार का कोई शुल्क लगता है . आपसे निवेदन कृपया बताये और जागरण प़र ब्लॉग डालने प़र भी किसी किस्म का कोई शुल्क है या वह निशुल्क है

गुरुवार, 22 अप्रैल 2010

फतवों और फरमानों का देश


भारत में लोकतंत्र भले ही बहाल हो  भले ही क़ानून  , प्रशासन हो परन्तु अब भी फतवों पंचायती फरमानों का डोर आरम्भ है . आखिर क्या कारण है की लोग ख़ुद को क़ानून से उपर समझ रहे है . क्या कारण है फतवों और पंचायत के फरमान हर माह मीडिया प़र छा जाते है . आजादी के ६३ सालो बाद भी पंचायतो प़र किसी जाती विशेष का अधिकार है फैसला , सज़ा देने का हक़ भी उसी जाती को है . भले वह फैसला कोई थोपा हुआ हो थोपे हुए फैसलों प़र भी सरकारे पुलिस हाथ बांधे क्यों खड़ी रहती है . क्या यह वोट बैंक की राजनीति है तभी सरकार ,पुलिस  कोई कारवाई नही करती . एसा क्यों होता जा रहा है जिस क्षेत्र में जिसकी संख्या अधिक वही उसका मालिक . क्या यही है समानाधिकार . वोट की राजनीति में दबंगई को बढ़ावा क्यों दिया जा रहा है अराजकता , अन्याय बढ़ने के कारणों को और शैह देने वाले कोन लोग है . पंचायत समाज को सही दिशाए देने के लिये होती है लेकिन आजकल की पंचायते जाती जैसी तुच्छ  मानसिकता में सिमट कर रह गयी है .  लेकिन इन्हें एसी मानसिकता प्रदान किसने  की फतवे कैसे भी हो लेकिन किसी किस्म की कोई भी करवाई का नही होना क्या दर्शाता है . इस तरह के फतव , पंचायती हुकूमत तो राजो , महाराजो के समय में होने का भी उल्लेख नही है . तब भी राजा का दरबार न्यायालय हुआ करता था लेकिन हाल कुछ एसा है जिसकी लाठी उसकी भैंस . लेकिन इन्हें चोधरी बनाने वाले लोग कोन है जिनके कारण इस  सबमे आम इंसान पिसा जा रहा है आज आम आदमी को ठीक से साफ़ पानी पिने तक की आजादी नही है और इन लोगो को अपने फरमान थोपने की . ये फतवे और ये दबंग लोगो का रवैया भारत को कहा ले जा रहे है समाज को अलग - थलग करने का हथकंडा भी यही से शुरू होता है . एक समाज को हर किस्म की भागीदारी दोऔर बाकी के लोगो के लिये कोई पॅकेज नोकरी कुछ नही .  ताकि बगावते हो और भारत के लोग जाती के नाम प़र लड़ते रहे मरते रहे . लेकिन ये चाहता कोन है कही यह फिर से भारतीयों को कमजोर करने की साज़िश तो नही जिसे भारत के लोग समझ नही पा रहे है

खाने में सुधार लाये बच्चो के सुनहरे भविष्य के लिये जागरूक हो



भारत मै शहर तेज़ी से बढ़ रहे है और उसी तेज़ी से खानपान भी बदल रहा है . खानपान महज़ स्वाद का मुदा बनकर रह गया है चाहे स्वाद के लिये स्वास्थ्य से समझोता ही क्यों न करना पड़े . एसा खानपान स्वाद की वजह भारतीयों को कायल तो बना रहा है लेकिन हड्डियों मै कमजोरी पैदा कर रहा है . शहर हो या गाव अब तो हर जगह ही यह प्रचलन चल निकला है . घी , दूध , दही , ताज़ा मखन खाने वाले लोग आइसक्रीम खाने प़र बड़ा ही गर्व अनुभव करते है . आज से लगभग १० साल पहले तक हरियाणा में सुबह का नाश्ता लह्स्सी घी और बाजरे के रोट और चटनी हुआ करते थे लेकिन अब चाए ब्रेड या बिस्कुट . जेम , ब्रेड टोस्ट और भी पता नही कितने पदार्थ सवाद से भरपूर . जो केवल स्वाद देते है और यही आदत आगे चलकर मजबूरी का रूप धारण करती है .लेकिन माँ बाप इसे मजबूरी बनाने में अहम भूमिका निभा रहे है आखिर क्यों . जो खाना शारीर को लगता नही है वही अपने बच्चो को खिलाया जा रहा है बच्चो के साथ कैसा खिलवाड़ है यह . एसा करने वाले दो तरह के माँ - बाप है १ वह जिन्हें सुबह दफ्तर जाना होता है और एक वह जिन्हें अमीरों के चोचले करने होते है या जो सुबह प्राथी आलू की गोभी की या दही जमाने में आलस बरतते है और अपना समय बच्चो में न देकर अपने जीवन का लुत्फ़ उठाते है . लेकिन आगे चलकर यह खाना बच्चो को उनकी हडियो को विकसित नही होने देता और उनकी हड्डिया चुने की तरह हो जाती है जो मजबूत नही होती .और व्यक्ति समय से पहले बीमारियों से ग्रस्त हो सकता है . जिससे की मानसिक संतुलन और शारीरक संतुलन बिगड़ सकता है आज कल खान पान में बहुत अधिक परिवर्तन आ गया है जो भारतीयों को बीमारियों की और ले जा रहा है . लेकिन माँ - बाप सही खुराक अपने बच्चो को दे तो वह भी एक बेहतर जीवन जी सकते है . अगर आपका बच्चा १० से १२ साल का है तो आप उससे केवल अच्छा पढने की ही उपेक्षा न करे उसके शारीर प़र भी ध्यान . बाजारों के चटर - पटर से बचाए और अपने पैसो को सही इस्तेमाल करे . अगर १६ से १८ साल की उम्र आपके बच्चे की है तो आप उसे कम से कम  १ ग्लास जूस रोजाना पिलाए . और बर्ह्म्चार का पालन कराए सुबह ४ या चाह बजे उठाकर आप उसे दोडाये . शुरुआत १ किलो मित्र से करे बाद में धीरे - धीरे बढाकर इसे आप चार किलो मित्र तक ले जाए . जिन बच्चो का स्पोर्ट्स में मन लगता है उन्हें १६ साल से रेस शुरू कर देनी चाहिए . स्पोर्ट्स में कारीअर भी है और नाम भी यश , पैसा सभी कुछ . लेकिन इस सब के लिये माँ - बाप के मार्गदर्शन की जरूरत होती है .  यह सब सवच्छ  भोजन से ही हो सकता है

मंगलवार, 20 अप्रैल 2010

अछे कर्म करने से आगे का भाग्य सुधार सकता है


दुखो के आने का कारण क्या होता है मनुष्य के कर्मो का फल . कर्म दो प्रकार के होते है एक भले कर्म और दुसरा बुरे . जब मनुष्य साधन - सम्पन्न हो जाता है तो वह जमकर उत्पात मचाता है और सभी धर्म कार्यो को भूलकर इश्वर भक्ति को भूलकर केवल रुपया कमाता है अथवा कमाए हुए रुपयों को खुलकर जीता है उनका आनन्द लेता है . मोह - माया मै डूबा मनुष्य अपने मित्रो से भी मुह मोड़ता है और कई बार परिवार भी उसे कोई ख़ास मैने नही लगता . वह सब कुछ गलत अच्छा खाने लगता है पश्चिमी सभ्यता का हो जाता है और अपनी आस्थाओं के साथ खिलवाड़ भी कर जाता है या उन्हें अंधविश्वास बताकर उनका अपमान करने लगता है . लेकिन समय चक्र जब सुखो का पूरा होता है तब धीरे - धीरे किसी न किसी तरीके से कर्मो का फल सामने अता है और मनुष्य या तो गरीब हो जाता है अथवा कोई बिमारी से गर्स्त भी हो जाता है . फिर भी बहुत सालो तक उसका घमंड नही टूट पाटा क्यों की वह होश मै नही होता . और जब गरीबी - दुःख हद्द से बढ़ते है तब वह हर मंदिर मै जाता है और ज्योतिषियों के पास जाता है . लेकिन ज्यादा समय ज्योतिषियों के पास ही जाता है वह कर्मो के रहस्य को जान नही पाता . मनुष्य तब संभलता है जब वह अपने कर्मो को समझता है उसे अहसास होता है तब जाकर वह कुछ धर्म कर्म कर अपने जीवन और अपने परिवार की स्थिति को धीरे - धीरे संभाल सकता है . इसमें उसे यह ध्यान मै रखना होता है जो कुछ भी हो रहा है और होगा सब भगवान् की कृपा से ही है लेकिन कर्म करना उसकी जिम्मेदारी कर्तव्य है . सनातम मै समस्त संसार को एक परिवार माना गया है लेकिन आज का मनुष्य अपने बीवी - बच्चो को परिवार मानता है और बाहर की दुनिया मै लुट खसूट कर अपने भाग्य को उजाड़ लेता है . इसलिए मनुष्य के कर्म सुख - दुःख मै सामान हो और सामान रूप से पक्षियों को दाना , कुत्ते को रोटी , पक्षियों को पानी , गाय को रोटी या हरा , खाग्ड़ को सानी हरा   देता रहे तो दुःख जीवन मै कभी भी नही आयेगा . अगर आपकी आर्थिक स्थिति कहती ही आप इन प्राणियों मै से किसी एक को पाल सकते है अथवा इन्हें भोजन दे सकते है तब भी यह आपकी श्रद्धा है . क्यों की यही सवर्ग है और यही नर्क है कर्मो का ही फेर है .

सोमवार, 19 अप्रैल 2010

पछतावा ' कवी कहता है की

सडक प़र चलते चलते ,दिखी एक चमचमाती सी चीज़ 
कपडे में लिपटी फिर भी , वो क्यों चमचमाए
सोच कर उसे उसने  , झोली में लिया  छुपाये
झोली में लिया छुपाये , सोचा क्या माल लगा हाथ में
दोड़ा दोड़ा जा रहा था , तभी ठोकर  लगी उसके  पाँव
टपक टपक कर रीस रही , फीर भी उसे  शर्म न आये
लालच से मन भरा था , घर जाकर जल्दी ये चीज़ झलक दिखाए
पहुच गया जब घर वह , तब चीज़ वो फूटी आँख न सुहाए
आत्मा भी गाली देने लगी , ये क्या तुम ले  आये
ये क्या तुम ले आये , क्या तुम ले आये
लालच भरा मन जब भी , कोई गलत चीज़ लाये
मन बड़ा पछताए , किसी का कोई क्यों फिर कुछ उठाये

क्या कोई हरिजन का लड़का ब्राहमण नही हो सकता

अगर कोई ब्राह्मण है और उसका बेटा व्यापारी तो उसे किस दृष्टि से ब्राह्मण कहा जाये . जब उसे कर्मकांडो और वेद , शास्त्र , गीता , पुराण का ज्ञान ही नही तो उसे किस तरह ब्राहमण कहा जा सकता है क्या उसे पंडित जी कह सकते है . या सही होगा उसे पंडित कहना ठीक इसी तरह किसी हरिजन का लड़का वेदों का कर्मकाण्डो का ज्ञान रखता है . उसे हरिजन कैसे कहा जा सकता है. उसे अधिकार क्यों नही ब्राहमण कहने का जब की उसे ज्ञान है . भगवान ने मनुष्य को कर्म करने के लिए धरती प़र भेजा है उसे अपना भविष्य बनाने के लिए दान धर्म करने के लिए पृथ्वी प़र भेजा है . कर्मानुसार वर्गो में शामिल होने का हक़ दिया है अगर किसी हरिजन का लड़का पवित्र रहता हुआ और सभी तरह के ज्ञान के बावजूद भी ब्राह्मण नही हो सकता यह मनुष्य की मनमानी करने जैसा है . कोई भी मनुष्य जन्म से महान नही होता तो जन्म से ही ब्राहमण या क्षत्रिय या शुद्र , वैश्य कैसे हो सकता है . जब से जातीय बनी है भारत कमजोर हो रहा है और धर्म परिवर्तन की समस्या से जूझने का भी कारण यही है . हम वर्ग व्यवस्था को भुलाकर जाती व्यवस्था में जब से आये है तभी से हम उलझते ही जा रहे है . भेद भाव बढ़ रहा है दबंगी बढ़ रही है और जो शुद्र है वह दबता ही जा रहा है . छोटा व्यापारी दब रहा है . और भारतीय विद्या से भारतीयों का कटाव हो रहा है अंग्रेजी बढ़ने का भी कारण यही है . अगर यह अधिकार दे दिया जाये तो वेद शास्त्रों गीता , और पुराणो की हर घर तक पहुच होगी. और भारतीयों में जाती - पाती की तुछ भावना दूर होगी

पानी बिन मै और तुम

 भले वैज्ञानिक चाँद प़र पानी ढूंढ़ रहे हो लेकिन धरती प़र पानी सिमट रहा है . राजस्थान , पंजाब, हरियाणा , मध्य परदेश सब जगह पानी को लेकर हाहाकार है . चार दिन बाद पानी की सप्लाई आती है हैंडपंप , कुए तालाब सुख रहे है . राजस्थान में लोग तालाब का पानी पी रहे है और साथ ही उसकी रक्षा के लिये रात को भी तालाब के पास लट्ठ लेकर खड़ा रहना पड़ रहा है कही कोई दुसरा गाव उनका पानी न चुरा ले . एम् पी , देहली में लोग पानी के लिये लड़ रहे है लम्बी लम्बी कतारों के बावजूद एक घडा ' मटका ' पानी मुश्किल से मिल रहा है . कई राज्यों में लोग २ , २ किलोमीटर की दूरी तय कर पानी की मटकी सर प़र उठाने को मजबूर है . पानी की किल्लत तक लोग सहन कर रहे है उपर से सूर्य देव की तपिश कई सालो का रिकार्ड तोड़ रही है एसे में एक मटका पानी और पैदल लाना पड़े तो सोचिये आज का इंसान कैसी जिन्दगी जी रहा है . जिसमे शोपिंग मोल , बड़ी बड़ी दुकाने तो है सड़के है लेकिन पिने का पानी नही अगर है तो सवच्छ नही . इंसान ग़रीबी से भले लड़ ले लेकिन प्यास से नही . भूख मिटाने की गोलिया भले ही मेडिकल साइंस में हो लेकिन प्यास भुजाने की नही . आखिर क्यों पानी सुख रहा है इसके कारणों में इंसान की आधुनिक होने की ललक भी हो सकती है आज इंसान पेड़ नही लगाता और न ही वनों का संरक्षण करने के लिये उसके पास समय है . हर इंसान को एक बड़ा घर बनाना है लेकिन उसके भीतर पेड़ लगाना जरूरी नही है हर इंसान को जमीन खरीदनी है फैक्ट्रिया लगाने का ब्योत बनाना है प्लाट काटने है कलोनिया काटनी है भले उसके लिये पड़ो से लदे बाग़ उजाड़ने पड़े . देशी- विदेशी कम्पनियों का दायरा बढ़ता जा रहा है बड़ी बड़ी इमारते बन रही है खेत खलिहानों को स्वार्थ पूर्ण खत्म किया जा रहा है . गाडी हर इंसान खरीद रहा है उनकी धुलाई - धुलाई प़र ही पर्तिदिन लाखो लिटर पानी खर्च हो रहा है . यह सब खरीद कर बनाकर भारत को आधुनिक बना दिया जाए लेकिन पानी से वंचित होकर . पानी बिना कहा होंगे हम और आप .