चिट्ठाजगत
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शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2010

किसान गरीब अथवा व्यापारी ?

किसान नाम सुनते ही मन में एक तस्वीर आती है मटमैले कपडे पहने हुए एक व्यक्ति की जो या तो खेत में पानी लगा रहा है या फिर कुछ बुवाई अथवा कटाई कर रहा है . लगता है गरीब वो जैसे गरीबी का मारा मजबूर . और दूसरी तरफ व्यापारी जिसके चहरे प़र हसी साफ़ कपडे . लेकिन मन में दिमाघ में चिन्ताओ का अम्बार लगा है . किसान क्या अब भी वही किसान है इसका जवाब खोजेंगे तो नही में मिलेगा . आज्ज का किसान व्यापारी से ज्यादा सम्पन्न और पैसे वाला है . न ही अब वह मेहनत है और न ही वह पसीना बहता है . संसाधनों ने किसान की दशा में काफी हद्द तक खुशहाली लाई है . वही व्यापारी के हालात आज ज्यादा बदतर है किसी भी दंगे फसाद लड़ाई झगडे में वायापरी को नुक्सान झेलना पड़ता है . लड़ाई झगड़ा हो या बंद या फिर किसी आरक्षण की आग झुलसता हमेशा व्यापारी वर्ग ही है . आखिर व्यापारी की इस दशा के पीछे जिम्मेदार कोन है राजनीति ? या फिर व्यापारी का  वोट बैंक न होना . व्यापारियों की ये हालात उनकी कमी के कारण तो नही हुए कही . कमी यह की उनका संगठित न रहना . आखिर क्या कारण है किसान को सुखा पड़ने प़र मुआवजा ,बाढ़  आने प़र मुआवजा ,और व्यापारी का नुक्सान बढ़ या किसी भी तरीके से नुक्सान हो उसका कोई वाली वारिस क्यों नही ? किसान का बेटा किसी दंगे की चपेट में आये तो वाह बीस लाख का और एक घरवाले को नोकरी . लेकिन व्यापार वर्ग से कोई बेटा हो तो  ? किसलिए ये भेदभाव क्या व्यापारी वर्ग इस देश का हिस्सा नही है . हालात इस प्रकार के है की सोचने को मजबूर करते है इन दोनों में से कोन गरीब कोन आमिर . कोन लाचार है कोन कमजोर है अथवा किसकी आवाज़ दबती जा रही है ये देश और देश के व्यापारियों को तय करना होगा .......................ये मीडिया को परखना है हम और आप को भी . आखिर यह देश चारदीवारी है . ब्राह्मण ,वैश्य ,क्षुद्र , क्षत्रिय
जय हिंद

बुधवार, 13 अक्टूबर 2010

इस धारावहिक की सभी घटनाये काल्पनिक है ?

इस धारावहिक की सभी घटनाये काल्पनिक है ? इनका वास्तविक जीवन से कोई सम्बन्ध नही है हम ओरतो प़र हो रहे अत्याचारों का विरोध करते है?  ये लेने  आपको हर रोज टीवी चैनल्स प़र दिखाई सुनाई देती होंगी . एक ओरत है अम्मा जी जो नही चाहती गाव में लड़की पैदा हो तभी तो वह उसे गिरा देती है अथवा लड़की की माँ को जान से मरवा देती है . वाह भई वाह क्या कहानी है . लाल टिका लगाये माला पहने लोग उन ओरतो के पीछे दोड़ते है जिनके पेट में लड़की हो . जैसे उन्हें और कोई काम ही नही है ? दस दस पहलवान एक ओरत के पीछे पड़े है क्यों की वह  एक बच्ची को जन्म देने वाली है . आखिर एसा कोन सा गाव है जहा की मुखिया का काम केवल इतना है लड़की को पैदा न होने देना ? क्या अपने कोई एसा गाव देखा या सूना जहा लड़की ही नही हो . क्या आपने  एसे गुंडों की फोज़ देखि जो सभी तरह की गुंडागर्दी छोड़ दबंगई  छोड़ एक ओरत के पीछे पड़े है वह भी इसलिए की उस ओरत की कोख में एक बच्ची है . आजकल टीवी चैनल मनोरंजन कम  और जहर ज्यादा फैला रहे है ओरत और मर्द के बीच एक एसी खाई उत्पन्न की जा रही है जिसे शायद भरना कुछ सालो में नामुनकिन होगा .देश में तमाम तरह की बुराइया है परन्तु उन्हें यही एक बुराई नज़र आती है . लेकिन इसमें जितना मसाला लगाकर पेश किया जा रहा है वह सब  पारिवारिक बुनियाद को तो हिला ही रहा है साथ ही भारत के घर घर में नफरत के विस्फोट पैदा कर रहा है . आखिर इस तरह के एक्सपेरिमेंट्स सस्ती टी आर पी के लिये होते है  .  यह एक विशेष समाज प़र निशाना भी होता है उस समाज को जलील करने के लिये वाह समाज है देश का बहुसंख्यक समाज .हिन्दू समाज को जलील करने का कोई मोका टीवी चैनल्स नही छोड़ना चाहते इसीलिए तो विलेन के कोस्तुम भी भारतीय संस्कृति के होते है जिससे भारतीय संस्कृति को बदनाम किया जा सके . मै इनसे पूछना चाहता हूँ कोन सा वह धर्म है जिसमे बच्चियों के पाँव धोये जाते है उनका माता कहकर आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है . कोन सा धर्म है जिसने स्त्री को पूरे जगत की माँ मना है . किस धर्म में धरती को माता इश्वर को माता कहा जाता है . इन सभी बातो के जवाब ये जानते है परन्तु इन्हें हिन्दू समाज के घर घर में नफरत का बीज बोना है और उसमे हिन्दू समाज को सड़ता हुआ देखना इनका उदेश्य है

बुधवार, 6 अक्टूबर 2010

अखिल भारतीय पंचनद समरक समिति से पंजाबियों को उम्मीदे .मेरी भी एक परार्थना है आपसे

अखिल भारतीय पंचनद समरक समिति उन पंजाबियों का एक संगठन है जो वर्तमान पंजाब से विस्थापित होकर आये थे . पंजाब जिसका आधा टुकडा पाकिस्तान में स्थित है उस प्रांत के पंजाबी हिन्दू , सिखों को एक जुट करने के लिये  और जिन बेकसूर लोगो की जाने दंगो में गयी थी जिनका कोई दोष न था उन्हें याद करने के लिये ही इसे साधू संतो और पंजाब केसरी के सम्पादक ने खड़ा किया है . इस संगठन ,समिति में कोई जाती नही है चारो वर्गों का मिश्रण है ये समिति . जिसमे पूरे देश से आकर हिन्दू समाज के लोग अपने पितरो का तर्पण करते है और उन्हें याद करते है . आजादी के ६२  सालो के बाद पंजाबी समुदाय एक मंच प़र आने की कोशिश कर रहा है . लेकिन मै  अपने ब्लॉग के माध्यम से  अखिल भारतीय पंचनद समरक समिति के साधू संतो और राष्ट्रिय अध्यक्ष से एक प्रार्थना करता हूँ  जो मेरे मन मस्तिष्क में वर्षो से है . वह इस परकार है .
वर्षो से पंजाबी समाज जीतोड़ मेहनत कर अपने परिवार का लालन पोषण कर रहा है . अपनी जमीन , खेत , पशु , गहने , घर सब कुछ गवाने के बाद भी पंजाबी समाज ने अपनी हिम्मत नही हारी . और उसी मेहनत का फल आज पंजाबी वर्ग देश के बड़े - बड़े महकमो में अग्रणीय भूमिका निभा रहा है . धर्म कर्म से लेकर  व्यापार . फिल्म इंडस्ट्री से खेल - कूद . हर जगह पंजाबी समुदाय ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है . लेकिन अभी कुछ कमिया है कुछ खामिया है जब तक उन्हें दूर नही किया  जाता हम नही कह सकते 'ओल इज वेल  ' . जैसे आज भी पंजाबी समुदाय की महिलाओं को गरीबी के चलते काम करना पड़ता है , बच्चो को दुकानों प़र नोकरी करनी पड़ती है रेहड़ीया लगाने को मजबूर होना पड़ता है . आखिर यह सब अब तक क्यों है क्यों ओरतो को बर्तन धोने के लिये मजबूर होना पडा , क्यों बच्चो को खेलने - पढने की उम्र में रेहड़ीया लगानी पड़ी . यह सब गरीबी के कारणहै  लेकिन हमारे समाज ने उन गरीबो के लिये किया क्या है असल सवाल तो यह है . क्या हम सभी जिम्मेदारिया सरकार प़र ड़ाल सकते है ? क्या पंजाबी समाज हो या देश का कोई भी समाज हमारी उनके पर्ती कोई जिम्मेदारी नही बनती . अब सवाल यह है हम उनकी मदद कसे करे . उनकी मदद करने के लिये हर गाव हर शहर में एक कमेटी नियुक्त की जाए जो एसी महिलाओं ,एसे बच्चो को शिक्षा दे रोजगार दे . ताकि हमारे समाज की एक बेहतर छवि बने . हम मिसाल बने बाकी समाज और जातियों में कुछ एसा किया जाए पंचनद समिति द्वारा . हर घर को महीने में १०० रूपए के लिये वचनबद्ध किया जाए और उस पैसे को पंजाबियों की तरक्की में लगाया जाए . यही हमारे बजुर्गो को सच्ची श्रधांजलि होगी . यही हिन्दू संस्कार होंगे और हिन्दू समाज की छवि पूरे विश्व में और भी अधिक बलशाली होगी .

सोमवार, 4 अक्टूबर 2010

योग गुरु के दावो में कितना सच ?

बाबा रामदेव जिन्हें योग गुरु के नाम से दुनिया जानती है लेकिन उनकी पहचान बदल रही है . वह एक योग गुरु , सन्यासी ही नही एक अच्छे बिजनेसमेन  भी है आज भारत ही नही विदेशो में भी दिव्यफर्मेची के काउंटर है . इतना सब है परन्तु कुछ तो कमी है कही ना कही की बाबा राजनीति में भी पाँव जमा रहे है . बाबा के मुद्दे देश को भ्रष्टाचार से मुक्त कराना , काला धन लाना है .गरीबी खत्म करना  भारत सवाभिमान जो की बाबा का ट्रस्ट  है को भगतो द्वारा  दान राशी भी मिलती है .बाबा में जो देशसेवा करने का जज्बा है क्या वह राजनीति में आये बिना पूरा नही होगा ? जब की आज बाबा के २ करोड़ से भी ज्यादा  अनुयायी है .जो हर संभव मदद दान देने को तत्पर रहते है . अब तक बाबा के ट्रस्ट को जो रुपया मिला है उस पैसे से कितने गरीबो का मुफ्त इलाज़ हुआ , कितने भूखो तक खाना पहुचा , कितने बाढ़ पीडितो को राहत मिली , कितनी गरीबी दूर हुई ?
                          यह बात न ही आजतक मेरे ज्ञान भण्डार  में है क्यों की मैंने या मेरे किसी भी दोस्त रिश्तेदार से मुझे इस तरह की जानकारी मिली . इतना जरूर है बाबा  गाडियों प़र गावो में जाकर भारत स्वाभिमान का प्रचार कर रहे है लेकिन इस तरह की कोई तस्वीर या विडिओ मैंने अब तक नही देखि जिसमे बाबा भारत के गरीबो की किसी परकार की मदद कर रहे हो . हो सकता है आपने देखि हो लेकिन मैंने न देखि हो इसके लिये मै क्षमा चाहता हूँ  . अगर कोई भाई इस बारे में कुछ बताये तो मै उसका आभारी रहूंगा . मै ये जाना चाहता हूँ की बाबा सत्ता में आने से पहले देश के गरीबो के लिये अथवा देश के लिये क्या कर रहे है .

बुधवार, 4 अगस्त 2010

कावरियो प़र लापरवाही हर बार कोई न कोई हादसा . आखिर क्यों ?

साल में दो बार आती है शिव रात्रि .करोडो कवरिये लाते है कावर .हर बार कोई न कोई हादसा . आखिर क्यों ?
कोन है लापरवाह इन सब हादसों का . कोन है है इन मोतो का जिम्मेदार . सरकार या कावरियो की लापरवाही .

या हिन्दुओ का जागरूक न होना . हर बार कावरिये किसी सडक दुर्घटना में मारे जाते है . आखिर क्यों शिव्भ्ग्त मारे जाते है . सरकारे क्यों नही देती जवाब . क्यों की कावरिये एक एसे समुदाय से है जो समुदाय अपने हक़ की बात तक नही करता . जो समुदाय है तो बहुसंख्यक परन्तु सो रहा है जैसे वह है ही नही . गहरी नींद में सो रहा है .  सदियों से . लेकिन क्या वह एसे ही सोता रहेगा . आपस में लड़ता रहेगा या शिव भगतो के साथ हुए हादसों प़र गंभीर होगा  या समझेगा देश को देशवासियों को उनकी या अपनी तकलीफों को  . अथवा अपने घर को ही देश दुनिया  समझता रहेगा .

मंगलवार, 3 अगस्त 2010

भगत सिंग तो पैदा हो परन्तु .........

आज फिर से एक क्रांति की जरुरत  है .                         है ना .........
लेकिन वह मेरे आपके घर में नही पडोसी के घर में पैदा होना चाहिए . है ना
क्यों मेरे घर में क्यों नही या आपके घर्म में क्यों नही ?
मेरे लड़के को डॉक्टर ,इंजिनियर , बनना है .
है ना ?
फिर कैसे हो भगत सिंग कैसे उठाये अन्याय के खिलाफ आवाज़ ?
मेरा लड़का क्यों पड़े इन चक्कर में .
यही सोच है हम भारतीयों की . आज की ढक लो कल किसने देखा .जिन्दगी को जियो मोज लो . यही सोच तो हो गयी है हम भारतीयों की . खाओ पियो मोज करो और सो जाओ .
फिर क्यों करते हो देश की चिंता . क्यों ख़ुद को राष्ट्रवादी कहते हो जैसा चल रहा है चलने दो . कभी कहते हो बाबा रामदेव हमारा , क्या तुम्हारी देश के पार्टी कोई जिम्मेदार नही है . अगर मोज लेनी है तो क्यों करते हो राष्ट्रवाद की बाते . राष्ट्रवादी बाते करते हो तो राष्ट्रवादी बनो अपन्प्नी जिम्मेदार को समझो . मै कोई आम आदमी नही तुम भी कोई आम आदमी नही ..........इस धरती की संतान है हम इसके लिये जान देना सिखों ............
याद करो अपने पूर्वजों की कुर्बानियों को . जातियों प़र मत लड़ो लड़ो तो देश के लिये मरो तो देश के लिये .

शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

काश्मिरियो प़र फिल्म ?

आजकल फिल्मो में कुछ नया दिखने लगा है .अरे आप सोच रहे होंगे मै आज भी अश्लीलता प़र लिख रहा हूँ . लेकिन आज अश्लीलता प़र नही आज बात होगी काश्मिरियो की . मासूमो की ? नई फिल्म आ रही है" लम्हा " इस फिल्म के प्रोमो देखकर लगता है की यह फिल्म कश्मीरी युवको की समस्याओं प़र है .पता नही फिल्म वाले मासूमो ? प़र फिल्म क्यों बना रहे है . चलो काश्मिरियो प़र फिल्म बन रही है तो इससे हमें क्या . लेकिन एक बात समझ में नही आती कब जाकर बनेगी कश्मीरी हिन्दुओ प़र कोई फिल्म . कब बनेगी असम के हिन्दुओ प़र कोई फिल्म ? कब बनेगी बरेली दंगो प़र कोई फिल्म ? कब बनेगी कोई पकिस्तान में हो रहे हिन्दुओ प़र अत्याचारों प़र फिल्म ?
शायद कभी नही ............
ये फिल्म वाले भी लगता है शर्मनिरपेक्षता  प़र उतारू हो गये है . माई नेम इज खान , चक दे इण्डिया , इन दोनों फिल्मो में क्या दिखाया गया . क्या दिखाने की कोशिश की गयी वही कोशिशे अगली फिल्मो में होंगी .फिल्मे समाज के लिये एक आईने का काम कर सकती है अगर समाज देश की समस्याओं को समान नजर से देखा जाए . लेकिन भाइयो हर सरकारी संसाधन प़र एक ख़ास समुदाय का पहला हक़ है . अब एक बात और लगती है कही बोलीवूड प़र भी किसी ख़ास समुदाय का पहला ...............तो नही .?